गुजरात के अरब सागर तट पर स्थित देश के प्रथम ज्योतिर्लिंग सोमनाथ मंदिर(Somnath Temple) की प्राण प्रतिष्ठा के 75 वर्ष पूरे होने पर पूरे प्रभास पाटन में भव्य अमृत महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। इस खास अवसर ने 11 मई 1951 के उस ऐतिहासिक दिन की यादों को फिर से ताजा कर दिया है जब सदियों की आस्था और संघर्ष के बाद सोमनाथ मंदिर में नए युग की शुरुआत हुई थी।
84 वर्षीय इतिहासकार भास्कर भाई वैध ने उस ऐतिहासिक समारोह की यादों को साझा करते हुए बताया कि उस समय वह केवल 10 साल के थे और अपने पिता के साथ प्राण प्रतिष्ठा समारोह में शामिल हुए थे। उनके अनुसार, उस दिन पूरा प्रभास पाटन “जय सोमनाथ” के जयघोष से गूंज उठा था। जहां नजर जाती, वहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ दिखाई देती थी और वातावरण में उत्साह, भक्ति और गर्व का अद्भुत संगम महसूस हो रहा था।
तोपों की गर्जना से क्षेत्र हुआ ऊर्जावान
भास्कर भाई ने बताया कि प्राण प्रतिष्ठा के शुभ क्षण पर मंदिर परिसर में लगाई गई 101 तोपों से सलामी दी गई थी। जैसे ही तोपों की गर्जना हुई पूरा क्षेत्र भक्तिमय ऊर्जा से भर उठा। उन्होंने कहा कि उस दृश्य को याद करते ही आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
उन्होंने समुद्र से जुड़ी एक खास याद भी साझा की। मंदिर के सामने अरब सागर में बड़ी संख्या में मछुआरों की नावें मौजूद थीं। हर नाव से “जय सोमनाथ” के उद्घोष सुनाई दे रहे थे। समुद्र की उठती लहरों, आसमान में गूंजते जयकारों और मंदिर परिसर की भव्यता ने उस पल को अविस्मरणीय बना दिया था।
दिन-रात किया जाता था प्रसाद वितरण
उस दौर की व्यवस्थाओं को याद करते हुए उन्होंने बताया कि श्रद्धालुओं के लिए प्रसाद की व्यवस्था लगातार चलती रहती थी। भाटिया धर्मशाला के कई कमरे बूंदी के लड्डू और गाठिया जैसे प्रसाद से भरे रहते थे। देशभर से आए लाखों भक्तों के बीच दिन-रात प्रसाद वितरण किया जाता था और सेवा कार्य बिना रुके चलता रहता था।
सोमनाथ मंदिर की वह प्राण प्रतिष्ठा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं थी बल्कि भारतीय आस्था, संस्कृति और पुनर्जागरण का प्रतीक बन गई थी, जिसकी गूंज आज 75 साल बाद भी लोगों की स्मृतियों में जीवित है।