मध्य प्रदेश के धार स्थित भोजशाला परिसर को लेकर वर्षों से चल रहे विवाद पर आखिरकार मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि पुरातात्विक अध्ययन केवल अनुमान नहीं बल्कि वैज्ञानिक और बहु-विषयी प्रक्रिया पर आधारित होता है। कोर्ट ने अपने फैसले में ASI की विस्तृत सर्वे रिपोर्ट और ऐतिहासिक साक्ष्यों को महत्वपूर्ण आधार माना। अदालत ने यह भी कहा कि यह निर्णय सुप्रीम कोर्ट के अयोध्या मामले में तय किए गए सिद्धांतों के अनुरूप है। आइए जानते हैं उन प्रमुख वैज्ञानिक और ऐतिहासिक आधारों को, जिनके आधार पर भोजशाला परिसर को मंदिर माना गया।
परमारकालीन निर्माण के मिले प्रमाण
ASI की 2189 पन्नों की रिपोर्ट में दावा किया गया कि मौजूदा संरचना के नीचे 10वीं-11वीं शताब्दी के परमारकालीन मंदिर के अवशेष मिले हैं। खुदाई में विशाल पत्थर, प्राचीन ईंटें और मंदिर शैली की नींव सामने आई।
‘शारदा सदन’ का उल्लेख
जांच के दौरान कई संस्कृत शिलालेख मिले, जिनमें इस स्थल को ‘शारदा सदन’ कहा गया है। शारदा देवी सरस्वती का ही एक स्वरूप मानी जाती हैं। अदालत ने इसे धार्मिक और शैक्षणिक केंद्र होने का महत्वपूर्ण संकेत माना।
सांस्कृतिक गतिविधियों के संकेत
परिसर में साहित्यिक ग्रंथ ‘पारिजात मंजरी’ से जुड़ा शिलालेख भी मिला। इसमें उल्लेख है कि इस नाटक का पहला मंचन इसी सरस्वती मंदिर में हुआ था। ASI ने इसे विद्या और सांस्कृतिक गतिविधियों के केंद्र का प्रमाण माना।
मंदिर शैली के स्तंभ और नक्काशी
रिपोर्ट के अनुसार परिसर में मौजूद 106 स्तंभों और कई पिलास्टरों पर हिंदू मंदिर वास्तुकला से जुड़ी नक्काशी और देवी-देवताओं की आकृतियां मिलीं। जांच में यह भी सामने आया कि इन स्तंभों का बाद में दोबारा इस्तेमाल किया गया था।
शिलालेखों को मिटाने की कोशिश
ASI ने कहा कि कई संस्कृत और प्राकृत शिलालेखों को जानबूझकर घिसा गया था। कुछ पत्थरों को उल्टा और असंगत तरीके से लगाया गया, जिससे उन पर लिखी सामग्री पढ़ी न जा सके।
मूर्तियों को नुकसान पहुंचाने के संकेत
कई पत्थरों और स्तंभों पर बनी धार्मिक आकृतियों को तोड़ा गया था। रिपोर्ट में कहा गया कि मूर्तियों के चेहरे और प्रतीकों को छेनी-हथौड़े से नुकसान पहुंचाया गया, जिसे मंदिर की मूल पहचान मिटाने की कोशिश माना गया।
संस्कृत शिलालेख अधिक प्राचीन
ASI को परिसर से 150 से ज्यादा संस्कृत और प्राकृत भाषा के शिलालेख मिले, जबकि अरबी-फारसी के शिलालेखों की संख्या अपेक्षाकृत कम पाई गई। रिपोर्ट में कहा गया कि संस्कृत शिलालेख ज्यादा पुराने और मूल संरचना से जुड़े हैं।
कारीगरों के निर्माण चिह्न भी मिले
जांच में खंभों और दीवारों पर त्रिशूल, स्वास्तिक और चक्र जैसे कई प्रतीक मिले। ASI ने इन्हें उस दौर के कारीगरों द्वारा इस्तेमाल किए गए निर्माण चिह्न बताया।
देवी-देवताओं की मूर्तियां बरामद
परिसर से गणेश, ब्रह्मा, नृसिंह और भैरव सहित कई देवी-देवताओं की मूर्तियां और कलाकृतियां बरामद हुईं। इसके अलावा मंदिर कला से जुड़े विशेष प्रतीक और दीवारों पर लाल गेरू से बने हाथों के निशान भी मिले, जिन्हें धार्मिक अनुष्ठानों से जोड़ा गया।
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