किशाऊ बांध परियोजना(Kishau Multipurpose Project) को लेकर करीब 86 साल से चली आ रही चर्चा अब आगे बढ़ती दिखाई दे रही है। नई दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली और हरियाणा के मुख्यमंत्रियों ने इस परियोजना को लेकर समझौते पर हस्ताक्षर किए। लंबे समय से राज्यों के बीच सहमति नहीं बनने के कारण यह योजना आगे नहीं बढ़ पा रही थी। किशाऊ एक बहुउद्देश्यीय बांध परियोजना है। इसे यमुना की सहायक नदी टोंस पर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड की सीमा के आसपास सांबरखेड़ा क्षेत्र में बनाने की योजना है।
प्रस्तावित बांध करीब 232.6 मीटर ऊंचा होगा और इसमें लगभग 1,562 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी जमा किया जा सकेगा। जरूरत के मुताबिक इस पानी को निचले इलाकों की ओर छोड़ा जाएगा। इस परियोजना की शुरुआत की कहानी अंग्रेजों के दौर तक जाती है। 1940 में पहली बार इसका विचार सामने आया था और 1944-45 में तत्कालीन पंजाब सरकार ने इसका सर्वे भी कराया था। हालांकि योजना आगे नहीं बढ़ सकी। 1962 में उत्तर प्रदेश सरकार ने इसे दोबारा शुरू करने की कोशिश की, लेकिन मामला फिर अटक गया।
किस राज्य को क्या मिलेगा?
परियोजना के पानी में हरियाणा का हिस्सा 633 मिलियन क्यूबिक मीटर, उत्तर प्रदेश का 411, राजस्थान का 124, दिल्ली का 80 और उत्तराखंड का 34 मिलियन क्यूबिक मीटर बताया गया है। इससे पेयजल के साथ करीब 97 हजार हेक्टेयर जमीन की सिंचाई में मदद मिलने की उम्मीद है।
परियोजना से लगभग 1,476 मिलियन यूनिट बिजली उत्पादन का भी अनुमान है। साथ ही, यमुना में पानी छोड़ने से उसके निचले हिस्से में जल प्रवाह बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
90% खर्च उठाएगी केंद्र सरकार
किशाऊ परियोजना की अनुमानित लागत करीब 15 हजार करोड़ रुपये है। इसका लगभग 90 प्रतिशत खर्च केंद्र सरकार वहन करेगी। खास बात यह है कि परियोजना को 2008 में ही राष्ट्रीय परियोजना का दर्जा मिल चुका था, लेकिन राज्यों के बीच सहमति नहीं बनने के कारण यह आगे नहीं बढ़ पाई थी।