अमरनाथ गुफा में प्राकृतिक रूप से बनने वाला पवित्र बर्फ का शिवलिंग सिर्फ़ चार दिनों में पिघल गया है। हालाँकि यह यात्रा कुल 57 दिनों तक चलनी थी, लेकिन सिर्फ़ चार दिनों के बाद ही ऐसी खबरें आईं कि पवित्र शिवलिंग का आकार काफ़ी छोटा हो गया है। ‘बाबा बर्फ़ानी’ के इस बर्फ़ीले लिंगम का 90 प्रतिशत से ज़्यादा हिस्सा पहले ही पिघल चुका है। बर्फ़ीले लिंगम के पिघलने का क्या कारण है? इसके कई कारण बताए जा रहे हैं, जैसे कि बहुत ज़्यादा गर्मी, हिमालयी क्षेत्र में बढ़ता तापमान, मौसम के बदलते पैटर्न और जलवायु परिवर्तन। इन कारणों के अलावा, एक और बड़ा कारण है: प्रकृति को नुकसान पहुँचाकर सुविधाओं का विस्तार और बुनियादी ढाँचे का विकास। एक दशक पहले तक, अमरनाथ यात्रा आसान नहीं थी और रास्ता भी बहुत मुश्किल था; हालाँकि, बाद में सुविधाएँ देने के नाम पर यात्रा के रास्ते पर विकास कार्य शुरू हो गए।
गुफा तक जाने वाले रास्तों को चौड़ा किया गया. यात्रा के मार्ग में अस्थायी टेंट और दुकानों की संख्या बढ़ाई गई और जो लंगर व्यवस्था चलती है, वो गुफा के नजदीक तक पहुंच गई. ये विकास यहीं नहीं रुका. हाल ही में अमरनाथ यात्रा के लिए रोपवे प्रोजेक्ट को मंजूरी दी गई और इसी के साथ शेषनाग और पंजतरणी के बीच सुरंग बनाने पर भी चर्चा हो रही है. ये वो विकास है, जो अमरनाथ यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं को बेहतर सुविधाएं तो दिला सकता है.
क्यों प्रभावित हो रही है पहाड़ों की ‘प्रकृति’ लेकिन एक बार सोचकर देखिए कि अगर इस ‘विकास’ के कारण अमरनाथ गुफा के आसपास की प्रकृति प्रभावित होती है और उसके कारण गुफा में बनने वाला शिवलिंग 4 दिन में ही पिघल जाता है तो ऐसे विकास का क्या फायदा होगा. सिर्फ 9 दिन पहले 29 जून को जब अमरनाथ गुफा में प्रथम पूजा हुई थी, तब पवित्र बर्फ से बने शिवलिंग का आकार 12 फीट था. उस वक्त इस प्रथम पूजा में जम्मू कश्मीर के उप-राज्यपाल मनोज सिन्हा शामिल हुए थे और इसके 4 दिन बाद 3 जुलाई से अमरनाथ यात्रा की शुरुआत हुई थी. 3 जुलाई से ही सिमटने लगा था आकार जो पहला जत्था 3 जुलाई को अमरनाथ गुफा में पहुंचा, उसका कहना है कि पवित्र शिवलिंग का आकार उसी दिन पिघलकर सिमटने लगा था, लेकिन 6 जुलाई को स्थिति और गंभीर हुई. और यही ‘शिवलिंग’ 90 प्रतिशत से ज्यादा पिघलकर सिर्फ 1 फीट से भी कम का रह गया और ऐसा नहीं है कि ये पहली बार हुआ. साल 2018 में यही पवित्र शिवलिंग यात्रा के सिर्फ 29 दिनों में पिघल गया था. 2020 में जब कोविड आया, तब भी ये 38 दिनों में पिघल गया था. 2022 में 28 दिनों में पिघल गया था और साल 2024 में सिर्फ 1 हफ्ते में पिघल गया था. इस बार भी ऐसा लगता है कि ये शिवलिंग 1 हफ्ते में पूरी तरह पिघल जाएगा और इसका बड़ा कारण है अमरनाथ गुफा में बढ़ती श्रद्धालुओं की संख्या और उनके लिए बढ़ती सुविधाएं.
बढ़ती जा रही है अमरनाथ यात्रियों की संख्या आज से दो दशक पहले तक ज्यादा से ज्यादा 1 लाख श्रद्धालु ही बाबा बर्फानी के दर्शन कर पाते थे. लेकिन जैसे-जैसे सुविधाएं बढ़ने से यात्रा आसान हुई, वैसे-वैसे श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ने लगी. साल 2003 में 1 लाख 70 हजार लोग अमरनाथ यात्रा पर पहुंचे थे, लेकिन 2011 और 2012 में यही आंकड़ा 6 लाख से ज्यादा पहुंच गया. साल 2016 में जब आतंकवादी बुरहान वानी मारा गया, तब श्रद्धालुओं की संख्या ढाई लाख से कम हो गई, लेकिन साल 2022 के बाद से इसमें फिर बढ़ोतरी हुई और पिछले साल 4 लाख 10 हजार लोगों ने अमरनाथ यात्रा की थी. कभी 22 फीट तक होता था शिवलिंग का आकार बड़ी बात ये है कि पहले जब कम श्रद्धालु आते थे, तब शिवलिंग का आकार 18 से 22 फीट होता था, लेकिन अब ये शिवलिंग अधिकतम 12 फीट का होता है और ये भी समय से पहले पिघल जाता है. इसका बड़ा कारण यही है कि लगभग 18 हजार फीट की ऊंचाई पर जहां अमरनाथ गुफा मौजूद है, वहां तापमान तेजी से बढ़ रहा है. ऐसा जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण भी हो रहा है और ऐसा लोगों की भीड़ बढ़ने से भी हो रहा है. आज से दो दशक पहले तक अमरनाथ यात्रा का रास्ता पूरी तरह प्राकृतिक होता था. वहां मिट्टी और चट्टान के रास्ते होते थे और लोगों के लिए इतनी ऊंचाई पर अमरनाथ गुफा तक पहुंचना आसान नहीं होता था, लेकिन बाद में धीरे धीरे सबकुछ बदलने लगा. उदाहरण के लिए पंचतरणी से गुफा तक का रास्ता पत्थरों वाला और ग्लेशियर के पानी के साथ बहने वाला प्राकृतिक रास्ता था.

