Financial Planning: देश के राज्यों की वित्तीय व्यवस्था को ज्यादा मजबूत बनाने के लिए 16वें वित्त आयोग ने अहम सुझाव दिए हैं। आयोग का मानना है कि केवल टैक्स से होने वाली कमाई बढ़ाना ही काफी नहीं है, बल्कि गैर-जरूरी खर्चों पर कंट्रोल रखना भी उतना ही जरूरी है। इसी वजह से आयोग ने राज्यों को अपनी आय बढ़ाने के साथ-साथ खर्चों को कम करने की सलाह दी है।
कमाई से तेज बढ़ रहा खर्च बना चिंता
आयोग के अनुसार, कई राज्यों में आय की तुलना में खर्च कहीं अधिक तेजी से बढ़ रहा है। यही वजह है कि अच्छी टैक्स वसूली होने के बावजूद कुछ राज्यों की आर्थिक स्थिति उम्मीद के हिसाब से मजबूत नहीं हो पा रही है। आयोग का कहना है कि राज्यों को अपनी कमाई बढ़ाने के प्रयास तेज करने होंगे और साथ ही गैर-जरूरी खर्चों में कटौती करनी होगी, ताकि वित्तीय संतुलन बना रहे।
बजट के बाहर कर्ज लेने से बचने की सलाह
16वें वित्त आयोग ने राज्यों को बजट से बाहर ज्यादा कर्ज लेने से बचने की भी सलाह दी है। आयोग का कहना है कि यदि किसी विशेष परिस्थिति में कर्ज लेना जरुरी हो, तो उससे जुड़ी पूरी जानकारी हर साल बजट दस्तावेज में सार्वजनिक की जानी चाहिए। इससे वित्तीय पारदर्शिता बनी रहेगी और लोगों को राज्य की वास्तविक आर्थिक स्थिति की जानकारी मिल सकेगी।
राजस्व घाटा अनुदान पर क्या कहा आयोग ने?
रिपोर्ट के मुताबिक, इस बार किसी भी राज्य को राजस्व घाटा अनुदान यानी Revenue Deficit Grant देने की सिफारिश नहीं की गई है। इसके अलावा किसी भी राज्य या क्षेत्र के लिए अलग से विशेष आर्थिक सहायता का प्रस्ताव भी नहीं रखा गया है। आयोग ने साफ किया है कि राज्यों को अपनी आय के अनुसार ही खर्च करना चाहिए। इसी वजह से यह भी सलाह दी गई है कि किसी भी राज्य का राजकोषीय घाटा उसकी कुल आर्थिक क्षमता के 3% के भीतर ही सीमित रखा जाए।
टैक्स बढ़ाने और खर्च कंट्रोल करने पर जोर
आयोग का मानना है कि राज्यों को अब अपनी टैक्स से होने वाली कमाई बढ़ाने पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए। साथ ही खर्च केवल जरूरत के अनुसार ही किया जाए और जहां जरूरत न हो, वहां गैर-जरूरी खर्चों पर कंट्रोल रखा जाए। आयोग के अनुसार, इससे राज्यों की आर्थिक स्थिति लंबे समय तक मजबूत बनी रहेगी और वित्तीय अनुशासन भी बेहतर होगा।
आम लोगों पर क्या होगा असर?
अगर राज्य आर्थिक रूप से मजबूत होते हैं तो इसका सीधा लाभ आम लोगों को मिलेगा। बेहतर वित्तीय स्थिति होने पर सड़क, स्कूल, अस्पताल और अन्य सार्वजनिक सुविधाओं पर पहले की तुलना में अधिक निवेश किया जा सकेगा। साथ ही राज्यों को बार-बार कर्ज लेने की जरूरत कम पड़ेगी और विकास योजनाओं के लिए पूरा धन उपलब्ध रहेगा। लंबे समय में यही वित्तीय मजबूती सरकारी परियोजनाओं को गति देने और नागरिकों को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराने में अहम भूमिका निभा सकती है।
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