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बिना जांचे AI कंटेंट का हवाला देने वाले वकीलों पर गिरेगी गाज, बार काउंसिल ऑफ इंडिया करेगी अनुशासनात्मक कार्रवाई

सुप्रीम कोर्ट ने 2 जुलाई के अपने फ़ैसले में कानूनी बिरादरी को एक कड़ा संदेश दिया है। कोर्ट ने कहा है कि न्यायिक कार्यवाही में मनगढ़ंत या AI से बने पुराने फैसलों पर भरोसा करने के मामले में “ज़ीरो टॉलरेंस” की नीति अपनाई जाएगी। ‘पूजा रमेश सिंह बनाम जम्मू-कश्मीर बैंक लिमिटेड और अन्य’ (2026) मामले में, कोर्ट ने NCLT और NCLAT के आदेशों को रद्द कर दिया। कोर्ट ने पाया कि उन्होंने ऐसे फैसलों का हवाला दिया था जो असल में मौजूद ही नहीं थे और गलत अंशों का इस्तेमाल किया था।

AI से बने पुराने फैसलों पर भरोसा करने के मामले में ज़ीरो टॉलरेंस की नीति

जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने कहा कि काल्पनिक सामग्री पर आधारित कोई भी फैसला शुरू से ही अमान्य होता है और यह कानून के शासन को कमजोर करता है।

कोर्ट ने AI द्वारा बनाई गई गलत या काल्पनिक सामग्री के घुसपैठ की तुलना न्याय प्रणाली में ज़हरीले रिसाव से की। कोर्ट ने कहा कि यह अदृश्य और खतरनाक होता है और जब तक इसका पता चलता है, तब तक यह विनाशकारी हो चुका होता है। कोर्ट ने पाया कि ऐसी सामग्री न्यायिक निर्णय की प्रक्रिया को दूषित करती है और उसके मूल आधार को ही खत्म कर देती है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ चेतावनी दी कि जो वकील बिना जांचे-परखे AI से बनी सामग्री का हवाला देते हैं, वे कदाचार करते हैं। साथ ही, ऐसी सामग्री पर न्यायिक भरोसा करना एक गंभीर चूक है।

ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए दिशा-निर्देश तय

कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया को निर्देश दिया कि वह एक कमेटी बनाए। यह कमेटी इस मुद्दे पर विचार-विमर्श करे कि कैसे बार के सदस्य अदालतों में नकली और काल्पनिक सामग्री को असली कानूनी फैसलों के तौर पर पेश करते हैं। कोर्ट ने बार काउंसिल को यह भी निर्देश दिया कि वह इस मुद्दे को पूरी गंभीरता से ले, इस पर अच्छी तरह विचार करे और ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए दिशा-निर्देश तय करे। साथ ही, नियमों के उल्लंघन पर अनुशासनात्मक कार्रवाई का प्रावधान भी करे।

एक वकील के तौर पर, मैं इस फैसले को एक अहम मोड़ मानता हूं। यह इस बात को पुख्ता करता है कि भले ही टेक्नोलॉजी कानूनी रिसर्च में मदद कर सकती है, लेकिन यह वकीलों की उस ज़िम्मेदारी की जगह नहीं ले सकती जिसके तहत उन्हें अदालत की कार्यवाही में किसी पुराने फैसले पर भरोसा करने से पहले उसकी सच्चाई की जांच-पड़ताल करनी होती है। कोर्ट रूम में मनगढ़ंत हवाला देने की कोई जगह नहीं है और हर स्तर पर जवाबदेही तय की जाएगी।

 

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