दिल्ली की साकेत कोर्ट(Saket Court) ने शाहीन बाग के एक सार्वजनिक कब्रिस्तान से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण आदेश जारी किया है जिसमें उसने कहा है कि सार्वजनिक कब्रिस्तान में किसी एक कब्र पर किसी व्यक्ति का स्थायी या विशेष निजी अधिकार नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने उस व्यक्ति की अंतरिम याचिका खारिज कर दी जिसने अपनी दिवंगत पत्नी की कब्र को कुछ वर्षों तक दोबारा इस्तेमाल किए जाने से रोकने की मांग की थी।
याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि उसकी पत्नी का निधन वर्ष 2021 में हुआ था और उन्हें शाहीन बाग के कब्रिस्तान में दफनाया गया था। उसका तर्क था कि धार्मिक परंपराओं के अनुसार, जब तक शव पूरी तरह मिट्टी में न मिल जाए तब तक उसी स्थान पर किसी दूसरे व्यक्ति को दफनाना उचित नहीं माना जाता। उसने स्पष्ट किया कि वह कब्र पर स्थायी अधिकार नहीं चाहता बल्कि केवल सात वर्ष तक उसे सुरक्षित रखने का निर्देश चाहता है ताकि मृतका की गरिमा बनी रहे।
अदालत ने वैज्ञानिक साक्ष्यों पर दिया जोर
सुनवाई के दौरान कब्रिस्तान प्रबंधन ने कोर्ट को बताया कि सार्वजनिक कब्रिस्तान सीमित भूमि पर संचालित होते हैं और वहां किसी एक व्यक्ति को किसी विशेष कब्र पर विशेष अधिकार नहीं दिया जा सकता। कोर्ट ने भी कहा कि यह साबित करने के लिए कोई वैज्ञानिक या विश्वसनीय प्रमाण पेश नहीं किया गया कि किसी शव को पूरी तरह मिट्टी बनने में सात साल का समय ही लगता है। सिर्फ किसी का कहा मान लेने से ही इस पर कोई फैसला सुना देना सही नहीं होगा।
सार्वजनिक हित को दी प्राथमिकता
इसके साथ ही कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि सार्वजनिक उपयोग के लिए उपलब्ध कब्रिस्तान की जमीन पूरे समुदाय की जरूरतों के लिए है। ऐसे में किसी एक कब्र को लंबे समय तक सुरक्षित रखने का आदेश देना सार्वजनिक संसाधन पर निजी अधिकार स्थापित करने जैसा होगा जिसे स्वीकार नहीं किया जा सकता।
मुख्य मामले की सुनवाई जारी रहेगी
हालांकि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यह आदेश केवल अंतरिम राहत से संबंधित है। यदि याचिकाकर्ता मुख्य सुनवाई के दौरान अपने दावों के समर्थन में वैज्ञानिक, धार्मिक या अन्य ठोस साक्ष्य प्रस्तुत करता है तो अदालत उन पर कानून के मुताबिक इस पर विचार करेगी।