प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नीति आयोग की 11वीं शासी परिषद की बैठक में अल-नीनो से पैदा होने वाली चुनौतियों को लेकर राज्यों को सतर्क रहने और जल संरक्षण पर विशेष जोर देने को कहा। उन्होंने AI के अवसरों का लाभ उठाने के साथ साइबर फ्रॉड और नशे जैसी सामाजिक चुनौतियों से निपटने की जरूरत बताई। PM मोदी ने कहा कि वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बावजूद भारत की विकास यात्रा दुनिया के लिए प्रेरणा बनी हुई है।
क्या होता है अल नीनो?
अल नीनो एक प्राकृतिक जलवायु प्रक्रिया है, जिसमें प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से का समुद्री सतही तापमान सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है। यह प्रक्रिया आमतौर पर हर दो से सात साल के बीच देखने को मिलती है और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों के मौसम को प्रभावित करती है।वैज्ञानिकों के मुताबिक, जब समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से करीब 2.5 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक बढ़ जाता है, तो उसे ‘सुपर अल नीनो’ की श्रेणी में रखा जाता है। 2026 में इसी तरह की स्थिति बनने की आशंका जताई जा रही है, जिसके कारण इसे अनौपचारिक रूप से ‘गॉडजिला अल नीनो’ कहा जा रहा है।
क्यों बढ़ी वैज्ञानिकों की चिंता?
इतिहास बताता है कि शक्तिशाली अल नीनो घटनाओं ने कई देशों में गंभीर मौसमीय प्रभाव डाले हैं। 1997-98 और 2015-16 के दौरान आए सुपर अल नीनो के समय दुनिया के कई हिस्सों में सूखा, बाढ़, जंगलों में आग और असामान्य गर्मी दर्ज की गई थी। इसी वजह से वैज्ञानिक 2026 के संभावित अल नीनो पर करीब से नजर रखे हुए हैं। हालांकि इसके अंतिम प्रभावों को लेकर अभी भी अनिश्चितता बनी हुई है।
सतर्कता जरूरी, घबराने की जरूरत नहीं
मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि ‘गॉडजिला अल नीनो’ को लेकर अभी निगरानी जारी है और इसके प्रभावों का सटीक आकलन समय के साथ ही संभव होगा। हालांकि, सरकारें और मौसम एजेंसियां संभावित चुनौतियों को देखते हुए तैयारी कर रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की जलवायु घटनाओं को लेकर जागरूक रहना और वैज्ञानिक सूचनाओं पर भरोसा करना जरूरी है। फिलहाल यह स्थिति सतर्कता की मांग करती है।
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