दिल्ली हाई कोर्ट ने बालिगों के लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर अहम टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि अगर दो बालिग अपनी इच्छा और आपसी सहमति से साथ रह रहे हैं तो उन्हें अपने साथी का चुनाव करने और उसके साथ रहने का पूरा अधिकार है। माता-पिता, रिश्तेदार या दोस्त उनकी पसंद में जबरन दखल नहीं दे सकते हैं। जस्टिस सौरभ बनर्जी ने यह टिप्पणी एक प्रेमी जोड़े की याचिका पर सुनवाई के दौरान की। लड़की के परिवार की ओर से कथित धमकियों को देखते हुए कोर्ट ने दोनों को पुलिस सुरक्षा देने के निर्देश भी जारी किए हैं।
‘सामाजिक मान्यताओं के नाम पर अधिकार नहीं छीन सकते’
कोर्ट ने 13 अगस्त को जारी अपने आदेश में कहा कि बालिगों के बीच आपसी सहमति से लिए गए व्यक्तिगत फैसलों को जाति, पंथ, रंग, धर्म या आस्था के आधार पर नियंत्रित नहीं किया जा सकता। जस्टिस सौरभ बनर्जी ने कहा कि सामाजिक सोच और पुरानी मान्यताओं के नाम पर किसी व्यक्ति के संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों को सीमित करना उसकी निजी पहचान और स्वतंत्रता को छीनने जैसा है।
परिवार या दोस्त नहीं डाल सकते दबाव
अदालत ने कहा कि अगर याचिकाकर्ताओं ने अपनी इच्छा, आपसी सहमति और जिम्मेदारी के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रहने का फैसला किया है तो माता-पिता, रिश्तेदार या दोस्तों को इसमें हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी को भी उनकी पसंद में रुकावट डालने, दबाव बनाने या उनकी जिंदगी और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को खतरे में डालने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
‘लिव-इन रिलेशनशिप शादी जैसा ही’
कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता कानूनी रूप से विवाहित नहीं हैं, लेकिन दोनों बालिग हैं और अपनी सहमति से साथ रह रहे हैं। अदालत के मुताबिक, आपसी सहमति से साथ रह रहे बालिगों का लिव-इन रिलेशनशिप शादी जैसा ही है, जब बात उनकी व्यक्तिगत पसंद और साथ रहने के अधिकार की हो।याचिकाकर्ता जोड़े ने कोर्ट को बताया कि दोनों की उम्र करीब 30 वर्ष है। वे पिछले कुछ समय से साथ रह रहे हैं और भविष्य में शादी भी करना चाहते हैं।
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