प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इंडोनेशिया यात्रा के दौरान प्रम्बानन मंदिर संकुल का दौरा सबसे अहम पड़ावों में शामिल रहा। इस दौरान इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो भी उनके साथ मौजूद रहे। दोनों नेताओं ने संयुक्त रूप से विश्व प्रसिद्ध प्रम्बानन हिंदू मंदिर के जीर्णोद्धार परियोजना की औपचारिक शुरुआत की गई।
2025 में बनी थी सहमति
प्रम्बानन मंदिर के पुनरुद्धार की नींव वर्ष 2025 में राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो की भारत यात्रा के दौरान रखी गई थी। दोनों देशों के संयुक्त बयान में भारत ने मंदिर के संरक्षण और जीर्णोद्धार में सहयोग का वादा किया था। अब इस परियोजना को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) सौंपा गया है। ASI, इंडोनेशिया के संस्कृति मंत्रालय और इंडोनेशियन हेरिटेज इंस्टीट्यूट के साथ मिलकर इस ऐतिहासिक धरोहर के पुनर्निर्माण पर काम करेगा।
The majestic Prambanan Temple! pic.twitter.com/pRS2S9X5gm
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एनास्टाइलोसिस तकनीक से होगा पुनर्निर्माण
करीब एक हजार वर्ष पुराने इस मंदिर के पुनरुद्धार में एनास्टाइलोसिस तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा। इस विधि में स्मारक को उसके मूल और प्राचीन पत्थरों का इस्तेमाल करते हुए दोबारा खड़ा किया जाता है, जिससे उसकी ऐतिहासिक महत्व बनी रहती है। यह परियोजना वर्ष 2026-27 में शुरू होगी। संयोग से यही वह समय भी होगा जब गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की जावा और प्रम्बानन यात्रा के 100 वर्ष पूरे होंगे।
On the way to the Prambanan Temple from Yogyakarta with President Prabowo Subianto.@prabowo pic.twitter.com/o0Vi9fYWmp
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इंडोनेशिया का सबसे बड़ा हिंदू मंदिर
मध्य जावा के जोगजकार्ता शहर से लगभग 17 Km उत्तर-पूर्व में स्थित प्रम्बानन मंदिर का निर्माण लगभग 850 ईस्वी में संजय वंश के राजा राकाई पिकातन ने कराया था। यह इंडोनेशिया का सबसे बड़ा हिंदू मंदिर है और भगवान शिव, विष्णु और ब्रह्मा को समर्पित है। मुख्य शिव मंदिर की ऊंचाई लगभग 47 मीटर है, जो देश के सबसे ऊंचे प्राचीन धार्मिक स्मारकों में गिना जाता है।
इंडोनेशिया के प्रम्बानन मंदिर में ॐ नमः शिवाय! pic.twitter.com/AuHupT2vSO
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रामायण की कहानी पत्थरों पर उकेरी गई
प्रम्बानन मंदिर की वास्तुकला दक्षिण भारत की पल्लव और चोल शैली से प्रभावित मानी जाती है। इसके ऊंचे शिखर, विशाल आंगन और मंडल आधारित स्थापत्य इसकी विशेष पहचान हैं। मंदिर की दीवारों पर भगवान राम के वनवास से लेकर रावण वध तक की पूरी रामायण को पत्थरों पर उकेरा गया है, जो इसे विश्व की महत्वपूर्ण सांस्कृतिक धरोहरों में शामिल करता है।
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