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जैन धर्म में सूरज ढलने के बाद क्यों नहीं खाना चाहिए खाना ? इसके पीछे छिपे हैं ये 3 अहम नियम

जैन धर्म(Jainism) अपने मूल सिद्धांत अहिंसा के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है। इस परंपरा में केवल मनुष्य या बड़े जीव ही नहीं बल्कि सूक्ष्म जीवों की रक्षा को भी समान महत्व दिया जाता है। यही कारण है कि अधिकांश जैन अनुयायी सूर्यास्त के बाद खाना खाने से बचते हैं। उनका विश्वास है कि रात के समय वातावरण में सूक्ष्म जीवों और कीटों की सक्रियता बढ़ जाती है। ऐसे में भोजन के दौरान अनजाने में किसी जीव को नुकसान पहुंच सकता है इसलिए सूर्यास्त के बाद भोजन न करने की परंपरा का पालन किया जाता है।

धार्मिक मान्यता के साथ-साथ इस परंपरा का संबंध स्वास्थ्य से भी जोड़ा जाता है। आयुर्वेद और आधुनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, दिन के समय पाचन क्रिया अधिक सक्रिय रहती है। वहीं, देर रात भोजन करने से पाचन प्रभावित हो सकता है और गैस, अपच या अन्य पाचन संबंधी समस्याओं का जोखिम बढ़ सकता है। यही वजह है कि जैन समुदाय में सूर्यास्त से पहले भोजन करने की आदत को स्वस्थ जीवनशैली का हिस्सा भी माना जाता है।

धार्मिक ग्रंथों में भोजन के नियम

जैन धर्म के प्राचीन ग्रंथ आचारांग सूत्र में अनुशासित जीवन और भोजन से जुड़े कई नियमों का जिक्र मिलता है। इन नियमों के मुताबिक भोजन सात्विक और निश्चित समय पर करना चाहिए। अनुयायियों को सूर्योदय के बाद और सूर्यास्त से पहले भोजन ग्रहण करने की सलाह दी गई है। इसके अलावा कुछ लोग एक बार बैठकर भोजन करना और दिन में दो बार भोजन करना जैसी परंपराओं का भी पालन करते हैं।

संयम और करुणा का संदेश

जैन धर्म में भोजन केवल भूख मिटाने का माध्यम नहीं बल्कि आत्मसंयम, करुणा और अनुशासन का अभ्यास भी माना जाता है। सूर्यास्त के बाद भोजन न करने की परंपरा इन्हीं मूल्यों से प्रेरित है। इसका उद्देश्य सभी तरह के जीवों के प्रति संवेदनशीलता बनाए रखना, संयमित जीवन अपनाना और शरीर व मन दोनों को संतुलित रखना है।

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