International Labour Day: आसमान छूती इमारतें, लंबी सड़कें और हमारे भोजन की हर थाली इन सबके पीछे करोड़ों लोगों की मेहनत लगी है। मानव सभ्यता के विकास की शुरुआत से लेकर आधुनिक डिजिटल युग तक, हर प्रगति की नींव श्रम पर ही टिकी रही है। चाहे वह मिट्टी को आकार देने वाला कुम्हार हो या खेतों में अनाज उगाने वाला किसान, हर मजदूर का समाज में अहम योगदान है।
क्या है 8 घंटे काम के पीछे की कहानी?
आज 8 घंटे काम करना आसान लगता है, लेकिन इसके पीछे कितने लोगों ने संघर्ष किया है शायद आप नहीं जानते होंगे। 19वीं सदी की औद्योगिक क्रांति के दौरान मजदूरों से 12 से 16 घंटे तक काम कराया जाता था। जब से शोषण बढ़ने लगा तो इसके खिलाफ 1 मई 1886 को अमेरिका में बड़ा आंदोलन शुरू हुआ। मजदूरों की मांग थी, ‘आठ घंटे काम, आठ घंटे आराम और आठ घंटे मनोरंजन।’ शिकागो के हैमार्केट स्क्वायर में हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान हिंसा हुई, जिसमें कई मजदूरों की जान गई। इस घटना ने वैश्विक स्तर पर श्रमिक अधिकारों की लड़ाई को आगे बढ़ाया।
विश्व स्तर पर मजदूर दिवस की शुरुआत
शिकागो की घटना के बाद 1889 में पेरिस में आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में यह निर्णय लिया गया कि हर साल 1 मई को अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस के रूप में मनाया जाएगा। यह दिन मजदूरों के संघर्ष, बलिदान और उनके अधिकारों की याद दिलाने के लिए समर्पित है।
भारत में मजदूर आंदोलन की शुरुआत
भारत में भी मजदूरों का शोषण पुराने समय में चरम पर था। इस अन्याय के खिलाफ 1920 में ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस की स्थापना की गई। देश में पहली बार 1 मई 1923 को मद्रास (अब चेन्नई) में मजदूर दिवस मनाया गया। इसकी शुरुआत लेबर किसान पार्टी ऑफ हिंदुस्तान ने की थी, जिसने श्रमिकों को संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
आजादी के बाद बने श्रमिक कानून
स्वतंत्रता के बाद भारत के संविधान ने मजदूरों के अधिकारों को प्राथमिकता दी। उनके हितों की रक्षा के लिए कई महत्वपूर्ण कानून बनाए गए, जैसे न्यूनतम मजदूरी अधिनियम 1948, औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 और कर्मचारी भविष्य निधि अधिनियम 1952। हाल के वर्षों में सरकार ने लेबर कोड्स लागू कर इन कानूनों को सरल और प्रभावी बनाने का प्रयास किया है। इसके बावजूद देश की बड़ी श्रमशक्ति आज भी असंगठित क्षेत्र में कार्यरत है, जहां सुरक्षा और स्थायित्व की कमी बनी हुई है।
समय के साथ बदले काम करने के तरीके
समय के साथ काम करने के तरीके भी बदल गए हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ऑटोमेशन के बढ़ते प्रभाव के कारण पारंपरिक नौकरियां प्रभावित हो रही हैं। इसके साथ ही गिग इकॉनमी का विस्तार हुआ है, जहां लोग डिलीवरी एजेंट, कैब ड्राइवर या फ्रीलांसर के रूप में काम कर रहे हैं। हालांकि इन नौकरियों में इतना झंझट नहीं है, लेकिन सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य बीमा और पेंशन जैसी सुविधाएं मिलें ये जरुरी नहीं है।
कोरोना बना था काल
कोरोना महामारी के दौरान लाखों प्रवासी मजदूरों का अपने गांवों की ओर पलायन इस बात का प्रमाण था कि सामाजिक सुरक्षा की कमी कितनी गंभीर समस्या है। रोजगार छिनने के बाद उनकी स्थिति ने यह दिखाया कि श्रमिक वर्ग आज भी असुरक्षित है और उन्हें मजबूत सुरक्षा तंत्र की आवश्यकता है। मजदूर केवल उत्पादन का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि देश की प्रगति की धुरी हैं। जब तक हर मेहनत करने वाले इंसान को सम्मान, सुरक्षा और उचित अधिकार नहीं मिलेंगे, तब तक विकास संभव नहीं है। अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस हमें यही याद दिलाता है कि समाज की असली ताकत उसके श्रमिक ही हैं।
Read More:
भीषण गर्मी में राहत की खबर! केंद्र ने उत्तराखंड को दी 150 MW अतिरिक्त बिजली की सौगात

