इलाहाबाद हाई कोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप(Live-in Relationship) को लेकर एक अहम और स्पष्ट टिप्पणी करते हुए कहा है कि यदि कोई व्यक्ति पहले से शादीशुदा है और उसका जीवनसाथी जीवित है, तो वह बिना तलाक लिए किसी अन्य व्यक्ति के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में नहीं रह सकता। अदालत ने इसे कानून के दायरे से बाहर बताते हुए ऐसी स्थिति में सुरक्षा देने से भी इनकार कर दिया।
न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह की एकल पीठ ने कहा कि विवाह एक वैधानिक संबंध है, जिसे समाप्त किए बिना किसी तीसरे व्यक्ति के साथ वैवाहिक या वैवाहिक जैसी स्थिति (लिव-इन) में रहना कानूनन स्वीकार्य नहीं है। ऐसे मामलों में पहले सक्षम न्यायालय से तलाक की डिक्री प्राप्त करना अनिवार्य है।
लिव-इन में सुरक्षा की मांग खारिज
याचिकाकर्ताओं ने अदालत से अपने संबंध को मान्यता देते हुए सुरक्षा की मांग की थी। उनका कहना था कि वे पति-पत्नी की तरह साथ रह रहे हैं और परिजनों से उन्हें खतरा है। लेकिन अदालत ने कहा कि जो संबंध स्वयं कानून के अनुरूप नहीं है, उसमें सुरक्षा देने का आदेश नहीं दिया जा सकता। अनुच्छेद 226 के तहत भी ऐसी राहत देना संभव नहीं है।
क्या है राज्य सरकार का पक्ष ?
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने याचिका का विरोध किया और कहा कि याचिकाकर्ता पहले से विवाहित हैं और उन्होंने अब तक तलाक नहीं लिया है। ऐसे में उनका किसी अन्य व्यक्ति के साथ लिव-इन में रहना अवैध है। सरकार की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि कानून ऐसे संबंधों को संरक्षण नहीं देता।
हाई कोर्ट ने यह भी माना कि दो वयस्कों को अपनी पसंद से साथ रहने का अधिकार है और इसमें जाति, धर्म या गोत्र जैसी बाधाएं नहीं होनी चाहिए। लेकिन अदालत ने स्पष्ट किया कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता असीमित नहीं होती। यह दूसरे व्यक्ति के वैधानिक अधिकारों के अधीन होती है।
जरूरत पड़ने पर मिल सकती है सुरक्षा
हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि याचिकाकर्ताओं को किसी प्रकार की धमकी या हिंसा का सामना करना पड़ता है, तो वे पुलिस प्रशासन से संपर्क कर सकते हैं। संबंधित अधिकारी मामले की जांच कर कानून के अनुसार आवश्यक सुरक्षा प्रदान कर सकते हैं।
कुल मिलाकर, हाई कोर्ट का यह फैसला यह स्पष्ट करता है कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता के साथ-साथ वैधानिक जिम्मेदारियों का पालन भी उतना ही आवश्यक है, और कानून के दायरे से बाहर जाकर किसी संबंध को संरक्षण नहीं दिया जा सकता।