मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच वैश्विक कूटनीति तेजी से करवट ले रही है। जहां एक ओर इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच संभावित गुप्त बातचीत की अटकलें हैं, वहीं दूसरी ओर नई दिल्ली अंतरराष्ट्रीय रणनीति का प्रमुख केंद्र बनता दिख रहा है। हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के साथ युद्ध को 5 दिन के लिए रोकने की घोषणा के बाद, उन्होंने सबसे पहले भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से फोन पर बात की जो अपने आप में एक बड़ा कूटनीतिक संकेत है।
सिर्फ PM मोदी से बातचीत
ट्रंप ने इस अहम फैसले के बाद किसी यूरोपीय, अरब या अन्य वैश्विक नेता से संपर्क नहीं किया, बल्कि सीधे पीएम मोदी से बातचीत की। विशेषज्ञों का मानना है कि यह दर्शाता है कि अमेरिका भारत को एक भरोसेमंद और महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार के रूप में देखता है। यह सिर्फ सूचना साझा करना नहीं, बल्कि आगे की रणनीति पर सहयोग का संकेत है।
होर्मुज पर फोकस, अमेरिका का सख्त रुख
भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने स्पष्ट किया कि ट्रंप और मोदी की बातचीत का मुख्य मुद्दा मिडिल ईस्ट और खासतौर पर होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खुलवाना था। अमेरिका का मानना है कि यह एक अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग है और ईरान द्वारा तेल व गैस आपूर्ति को बाधित करने की धमकी वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए खतरा है।
इजरायल का भरोसा, भारत की बढ़ती भूमिका
इजरायल के राजदूत रुविन अजार का बयान कि “भारत जंग रोकने में अहम भूमिका निभा सकता है”, भारत की बढ़ती कूटनीतिक ताकत को दर्शाता है। भारत की ‘शांत कूटनीति’ और संतुलित रुख उसे वैश्विक मंच पर मजबूत बनाता है।
जहां पाकिस्तान खुद को अमेरिका-ईरान के बीच मध्यस्थ के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहा है, वहीं भारत एक जिम्मेदार वैश्विक शक्ति की तरह व्यवहार कर रहा है। भारत का लक्ष्य केवल वार्ता नहीं, बल्कि वैश्विक सप्लाई चेन खासतौर पर ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित रखना है। यही कारण है कि मिडिल ईस्ट में शांति की किसी भी पहल में भारत की भूमिका अहम मानी जा रही है।