पश्चिम बंगाल के हुगली ज़िले के चंदननगर की मशहूर ‘जोलभोरा संदेश’ मिठाई को आधिकारिक तौर पर प्रतिष्ठित ‘ज्योग्राफ़िकल इंडिकेशन’ (GI) टैग मिला है। यह टैग इसकी अनोखी उत्पत्ति, पारंपरिक बनाने के तरीके और सदियों पुराने सांस्कृतिक महत्व को मान्यता देता है। माना जाता है कि यह मिठाई 220 साल से भी ज़्यादा पुरानी है और बंगाल की सबसे मशहूर मिठाइयों में से एक है। यह चंदननगर की समृद्ध पाक-कला विरासत से गहराई से जुड़ी हुई है। 26 जून, 2026 को जोलभोरा को GI टैग दिया गया।
A Sweet Triumph for Hooghly! Chandannagar’s Iconic Jolbhora Sandesh Secures GI Tag
West Bengal’s rich culinary heritage has earned another prestigious recognition. Chandannagar’s famous Jolbhora Sandesh has officially been granted a Geographical Indication (GI) Tag,… pic.twitter.com/24x9HiJ488
— Bengal Leap (@BengalLeap) June 28, 2026
जोलभोरा संदेश को GI मान्यता
चंदननगर की जोलभोरा को 26 जून, 2026 को GI टैग मिला। इस मिठाई को सूर्य और उनके बेटे सिद्धेश्वर मोदक ने बनाया था। हालाँकि यह मिठाई राज्य के कई हिस्सों में बनाई और खाई जाती है, लेकिन यह सर्टिफ़िकेशन हुगली ज़िले के इस शहर में इसकी उत्पत्ति और इसकी विरासत को मान्यता देता है।
Did you know the original jolbhora was invented over 200 years ago to prank a newly-wed son-in-law?
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— My.Kolkata (@TT_My_Kolkata) June 11, 2026
जोलभोरा संदेश के बारे में
जोलभोरा संदेश अपने खास बनाने के तरीके के लिए मशहूर है। ताज़े छेने (पनीर) और चीनी से बनी इस मिठाई के अंदर लिक्विड नोलन गुड़ (खजूर के पेड़ के गुड़ का सिरप) या चीनी की चाशनी का एक छिपा हुआ हिस्सा होता है। इसकी नरम बाहरी परत के अंदर लिक्विड भरा होता है, जो मुँह में काटते ही फूट जाता है, जिससे यह किसी भी दूसरी पारंपरिक बंगाली मिठाई से अलग बन जाती है।
जोलभोरा संदेश कैसे बनी?
जोलभोरा संदेश की उत्पत्ति स्थानीय कहानियों और मज़ेदार परंपराओं से जुड़ी है। स्थानीय इतिहास के अनुसार, इस मिठाई को सबसे पहले 19वीं सदी की शुरुआत में मशहूर हलवाई सूर्य कुमार मोदक ने बनाया था। आम धारणा के अनुसार, इसी सांस्कृतिक परंपरा के कारण 1818 में यह मिठाई बनी।
हुगली के तेलनीपारा के ज़मींदार ने अपनी पत्नी और बेटियों के कहने पर हलवाई सूर्य कुमार मोदक से एक ऐसी मिठाई बनाने को कहा जो नए दामाद को चकमा दे सके। कई बार कोशिश करने और गलतियों से सीखने के बाद, उन्होंने आखिरकार परिवार के एक जश्न के दौरान अपने दामाद के लिए सरप्राइज़ के तौर पर यह मिठाई बनाई।
जब कुछ न जानते हुए दामाद ने इसका एक टुकड़ा खाया, तो मिठाई के अंदर भरी चाशनी बाहर निकल आई, जिससे उसके कपड़े भीग गए और मज़ेदार योजना पूरी हो गई। इसके बाद इस मिठाई का नाम ‘जोलभोरा’ रखा गया। यह नई खोज जल्द ही बहुत लोकप्रिय हो गई और तब से चंदननगर की पहचान बन गई है।
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