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UN ने किया पकिस्तान को बेनकाब, अल्पसंख्यक लड़कियों के साथ जबरन धर्मांतरण का घिनौना खेल

संयुक्त राष्ट्र की ताज़ा रिपोर्ट ने पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों, खासकर हिंदू और ईसाई समुदाय की लड़कियों के खिलाफ हो रहे जबरन धर्मांतरण और अत्याचारों को उजागर किया है। रिपोर्ट के मुताबिक, ये घटनाएं व्यवस्थित तरीके से हो रही हैं और धार्मिक स्वतंत्रता के दावों पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं। पाकिस्तान विशेष रूप से सिंध प्रांत प्रभावी रूप से जबरन धर्मांतरण के लिए एक कारखाना बन गया है। ऐसे धर्मांतरणों की शिकार होने वालों में ज्यादातर हिंदू लड़कियां थीं।

सिंध बना घटनाओं का केंद्र

रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान का सिंध प्रांत इन मामलों का सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभरा है। कुल मामलों में से करीब 80 प्रतिशत घटनाएं इसी इलाके में दर्ज की गई हैं। अपहरण, जबरन शादी और फिर कानूनी प्रक्रियाओं के जरिए इसे स्वेच्छा से धर्मांतरण का रूप देने का पैटर्न सामने आया है।

डराने वाले आंकड़े सामने

साल 2025 के आंकड़ों के अनुसार, जबरन धर्मांतरण के मामलों में 75 प्रतिशत पीड़ित हिंदू लड़कियां थीं, जबकि 25 प्रतिशत ईसाई समुदाय से थीं। इन पीड़ितों की उम्र अधिकतर 14 से 18 वर्ष के बीच बताई गई है, जो इस समस्या की गंभीरता को और बढ़ाता है।

जबरन शादी और सहमति पर सवाल

UN विशेषज्ञों ने साफ कहा है कि बंदूक की नोक पर, अपहरण के बाद या सामाजिक दबाव में की गई शादियों को सहमति कहना गलत है। खासकर नाबालिग लड़कियों के मामलों में सहमति का कोई महत्व नहीं होता, जिससे यह पूरी प्रक्रिया मानवाधिकारों का उल्लंघन बन जाती है।

कानूनी व्यवस्था पर उठे सवाल

रिपोर्ट में पाकिस्तान की कानूनी प्रणाली पर भी सवाल उठाए गए हैं। जबरन धर्मांतरण को स्पष्ट रूप से अपराध की श्रेणी में न रखना, और विवाह की न्यूनतम आयु को सख्ती से लागू न करना, इन घटनाओं को बढ़ावा देने वाले प्रमुख कारण बताए गए हैं।

न्यायिक प्रक्रिया भी कठघरे में

पीड़ित लड़कियों को अदालतों में भी सुरक्षा का अहसास नहीं होता। रिपोर्ट में कहा गया है कि न्यायालयों के भीतर भी उन्हें दबाव और धमकियों का सामना करना पड़ता है, जिससे निष्पक्ष न्याय मिलना मुश्किल हो जाता है।

वैश्विक चिंता बढ़ी

इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान की मानवाधिकार स्थिति को लेकर चिंता बढ़ गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि इन खुलासों ने देश के भीतर अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और अधिकारों पर गंभीर बहस को जन्म दिया है।

 

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