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पाकिस्तान में बकरी चोरी ने बिछाया खूनी जाल, 9 साल की दुश्मनी में 48 मौतें

पाकिस्तान के उत्तरी सिंध प्रांत के शिकारपुर ज़िले में बकरियों की चोरी का एक मामूली मामला एक खूनी संघर्ष में बदल गया, जो कई सालों तक चला। जुनेजो और कलहोरा समुदायों के बीच चले इस विवाद में नौ सालों के दौरान 48 लोगों की जान चली गई। हाल ही में, दोनों पक्षों ने एक जिरगा के माध्यम से समझौता कर लिया है, जिससे इस क्षेत्र में शांति की उम्मीदें बढ़ गई हैं।

स्कूल और गांव बने वीरान

इस लंबे संघर्ष का असर आम जनजीवन पर गहराई से पड़ा। जलालपुर जैसे गांवों में स्कूल बंद हो गए और कई इमारतें खंडहर में बदल गईं। लोग एक-दूसरे के इलाकों में जाने से डरते थे, जिससे पूरे क्षेत्र को ‘नो-गो ज़ोन’ जैसा बना दिया गया। बच्चों की पढ़ाई तक प्रभावित हुई।

कैसे शुरू हुआ विवाद

स्थानीय लोगों के अनुसार, नौ साल पहले बकरी चोरी की एक घटना से इस झगड़े की शुरुआत हुई। आरोप-प्रत्यारोप के बीच मामला बढ़ता गया। जिरगा में सुलह की कोशिश हुई जहां कुछ आरोपियों को माफ कर दिया गया, लेकिन एक व्यक्ति को माफी नहीं मिली। यही असहमति बाद में हिंसक संघर्ष में बदल गई।

कई परिवारों ने खोए अपने लोग

इस दुश्मनी में कई परिवार तबाह हो गए। एक स्थानीय निवासी के अनुसार, उनके परिवार के कई सदस्य मारे गए, जबकि उनकी बिरादरी के 20 से अधिक लोग इस संघर्ष में जान गंवा चुके हैं।

जिरगा से हुआ समझौता

हाल ही में सक्खर में तीन दिन तक चला एक बड़ा जिरगा आयोजित किया गया, जिसमें दोनों समुदायों ने विवाद खत्म करने पर सहमति जताई। हालांकि, अदालतों की मौजूदगी के बावजूद जिरगा जैसे गैर-कानूनी मंचों के इस्तेमाल पर सवाल उठ रहे हैं।

जिरगा प्रणाली पर विवाद

जिरगा स्थानीय बुजुर्गों और प्रभावशाली लोगों का अनौपचारिक समूह होता है, जो विवाद सुलझाने का प्रयास करता है। समर्थकों का मानना है कि यह तेजी से समाधान देता है, जबकि आलोचकों के अनुसार यह कानून और पारदर्शिता के खिलाफ है। सिंध हाईकोर्ट पहले ही जिरगा पर प्रतिबंध लगा चुका है।

प्रशासन और नीति की भूमिका

पुलिस अधिकारियों का कहना है कि ऐसी सुलह सरकार की सरेंडर पॉलिसी का हिस्सा है, जिससे आपसी दुश्मनी खत्म कर विकास कार्यों को बढ़ावा दिया जा सके। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि स्थायी शांति के लिए कानूनी व्यवस्था को मजबूत करना जरूरी है।

क्या टिक पाएगी शांति?

इससे पहले भी दोनों समुदायों के बीच समझौता हुआ था, जो ज्यादा समय तक नहीं टिक पाया। ऐसे में अब सवाल है कि क्या यह नई सुलह स्थायी शांति ला पाएगी या फिर पुरानी दुश्मनी दोबारा सिर उठाएगी।

 

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