आज भारतीय रेल(Indian Railways) के इतिहास का बेहद खास दिन है। करीब 173 साल पहले इसी तारीख को देश में पहली बार रेलगाड़ी पटरी पर दौड़ी थी, जिसने भारत में परिवहन के एक नए युग की शुरुआत की। आज का विशाल भारतीय रेल नेटवर्क दुनिया का चौथा सबसे बड़ा रेल नेटवर्क माना जाता है, लेकिन इसकी शुरुआत बेहद साधारण तरीके से हुई थी।
साल 1853 में जब पहली ट्रेन चलाई गई, तब महज 14 डिब्बों को खींचने के लिए तीन इंजनों की जरूरत पड़ी थी। इस ऐतिहासिक यात्रा में लगभग 400 यात्रियों को सफर करने का मौका मिला था, जो उस दौर में अपने आप में एक बड़ी बात थी।
कहां से कहां तक चली थी पहली ट्रेन
भारत की पहली पैसेंजर ट्रेन 16 अप्रैल 1853 को तत्कालीन बम्बई (अब मुंबई) के बोरीबंदर स्टेशन से ठाणे तक चलाई गई थी। यह ट्रेन दोपहर 3 बजकर 35 मिनट पर रवाना हुई और करीब 70 मिनट में 34 किलोमीटर की दूरी तय कर शाम 4:45 बजे अपने गंतव्य पर पहुंची। इस ऐतिहासिक ट्रेन का संचालन ग्रेट इंडियन पेनिनसुला रेलवे कंपनी ने किया था, जो उस समय देश की पहली रेलवे कंपनी थी।
इस ऐतिहासिक पल की भव्यता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि ट्रेन के रवाना होते समय उसे 21 तोपों की सलामी दी गई थी। यह उस दौर के लिए किसी बड़े उत्सव से कम नहीं था।
साहिब, सिंध और सुल्तान थे तीन इंजनों के नाम
पहली ट्रेन के तीनों इंजनों के नाम ‘साहिब’, ‘सिंध’ और ‘सुल्तान’ थे। ट्रेन के डिब्बे लकड़ी से बने हुए थे, जो आज के आधुनिक कोच की तुलना में बेहद साधारण और छोटे लगते हैं। इस सफर के दौरान ट्रेन ने बीच में भायखला और सायन स्टेशनों पर रुककर अपनी यात्रा पूरी की। भायखला स्टेशन पर इंजन में पानी भरा गया, जबकि दोनों स्टेशनों पर ट्रेन करीब 15-15 मिनट तक रुकी थी।
आज भले ही ट्रेनें तेज रफ्तार से सैकड़ों किलोमीटर का सफर तय कर रही हैं, लेकिन उस समय 34 किलोमीटर की यह यात्रा भी लोगों के लिए रोमांच और उत्साह से भरी हुई थी। यही छोटी-सी शुरुआत आगे चलकर भारतीय रेल को दुनिया के सबसे बड़े रेल नेटवर्क में से एक बनाने की नींव साबित हुई।