होर्मुज से सामान्य हुई आवाजाही : वैश्विक तेल बाजार में राहत के संकेत मिलने लगे हैं। होर्मुज में तनाव कम होने के बाद तेल टैंकरों की आवाजाही तेजी से सामान्य हो रही है। इसके साथ ही सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने भी अपने कच्चे तेल के निर्यात को लगभग युद्ध-पूर्व स्तर पर पहुंचाना शुरू कर दिया है। इससे बाजार में आपूर्ति बढ़ रही है और कच्चे तेल की कीमतों पर दबाव बन गया है।
क्रूड ऑयल में नरमी के आसार
अमेरिकी वित्तीय संस्था सिटीग्रुप (Citi) का अनुमान है कि यदि भू-राजनीतिक हालात सामान्य बने रहे और होर्मुज के रास्ते तेल आपूर्ति बाधित नहीं हुई, तो वर्ष के अंत तक ब्रेंट क्रूड की कीमत घटकर 60 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती है। कमजोर वैश्विक मांग, विशेषकर चीन में धीमी खरीदारी और बढ़ती सप्लाई इस गिरावट की बड़ी वजह बन सकती है।
भारत को कैसे होगा फायदा
कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट भारत जैसे बड़े आयातक देश के लिए राहत लेकर आ सकती है। इससे सरकारी तेल विपणन कंपनियों की लागत कम होगी और हाल के महीनों में हुए वित्तीय दबाव से उन्हें उबरने में मदद मिल सकती है। यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें लंबे समय तक नीचे रहती हैं, तो सरकार पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में भी राहत देने पर विचार कर सकती है। हालांकि इसका अंतिम फैसला टैक्स, विनिमय दर और घरेलू मूल्य निर्धारण पर भी निर्भर करेगा।
सऊदी और UAE ने बढ़ाई सप्लाई
सऊदी अरब ने अपने प्रमुख रास तनुरा टर्मिनल से तेल लोडिंग को फिर से तेज कर दिया है और निर्यात क्षमता युद्ध-पूर्व स्तर के करीब पहुंच रही है। वहीं UAE भी अपने सामान्य निर्यात स्तर पर लौट चुका है। होर्मुज के रास्ते प्रतिदिन बड़ी मात्रा में कच्चे तेल की आपूर्ति होने से वैश्विक बाजार में सप्लाई अधिशेष बनने की आशंका बढ़ गई है। यदि मध्य पूर्व में कोई नया तनाव पैदा नहीं होता और वैश्विक मांग कमजोर बनी रहती है, तो आने वाले महीनों में कच्चे तेल की कीमतों में और नरमी देखने को मिल सकती है। जबकि किसी भी नए भू-राजनीतिक घटनाक्रम से कीमतों में दोबारा उतार-चढ़ाव आ सकता है। फिलहाल ऊर्जा बाजार धीरे-धीरे स्थिरता की ओर बढ़ता नजर आ रहा है।
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