Poland Crisis: पोलैंड की राजधानी वारसॉ में शुक्रवार को संवैधानिक न्यायाधिकरण के बाहर उस समय तनाव बढ़ गया, जब दर्जनों प्रदर्शनकारी पुलिस से भिड़ गए। प्रदर्शनकारी प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क की सरकार के उस फैसले का विरोध कर रहे थे, जिसके तहत संवैधानिक न्यायाधिकरण के अध्यक्ष बोगदान श्विएन्चकोव्स्की के खिलाफ निलंबन की कार्रवाई की गई। कुछ प्रदर्शनकारियों ने अदालत की बाड़ पार करने की कोशिश की और कुछ ने पुलिसकर्मियों पर चीजें फेंकीं। हालात बिगड़ने पर पुलिस ने तीन लोगों को हिरासत में लिया और दंगा-रोधी पुलिस बल तैनात कर दिया।
राष्ट्रपति ने बीच रास्ते में मोड़ा विमान
स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पोलैंड के राष्ट्रपति कारोल नाव्रोकी ने सेनेगल जा रही अपनी फ्लाइट को बीच रास्ते से ही वापस मोड़ दिया। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा, ‘ऐसे समय में राष्ट्रपति का पोलैंड में होना जरूरी है. मैं सेनेगल की अपनी यात्रा बीच में छोड़ रहा हूं. मैं वापस लौट रहा हूं.’ इस घटनाक्रम के बाद पोलैंड में संवैधानिक व्यवस्था और न्यायपालिका को लेकर चल रहा राजनीतिक टकराव और गहरा गया।
अदालत के अध्यक्ष पर क्या कार्रवाई हुई?
पोलैंड के न्याय मंत्री वाल्डेमार जुरेक ने संवैधानिक न्यायाधिकरण के अध्यक्ष बोगदान श्विएन्चकोव्स्की और उपाध्यक्ष बार्टलोमीज सोचान्स्की के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। उन्होंने दोनों की कानूनी सुरक्षा यानी इम्युनिटी हटाने का अनुरोध किया है, ताकि उनके खिलाफ आपराधिक मामले में कार्रवाई की जा सके। इसके बाद न्यायाधिकरण की वेबसाइट पर अध्यक्ष को निलंबित किए जाने की जानकारी सामने आई। यह जानकारी स्थानीय समय के मुताबिक शाम करीब 6 बजे प्रकाशित हुई थी।
निलंबन की वजह पर स्थिति साफ नहीं
न्यायाधिकरण की वेबसाइट पर निलंबन की जानकारी आने के कुछ ही समय बाद वेबसाइट बंद हो गई। इस वजह से निलंबन के पीछे की आधिकारिक वजह की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी। सरकार का आरोप है कि श्विएन्चकोव्स्की संसद के बहुमत से चुने गए नए न्यायाधीशों को अदालत में काम संभालने से रोक रहे हैं। वहीं, PiS पार्टी के नेताओं ने इस कार्रवाई को देश की संवैधानिक व्यवस्था पर हमला बताया है।
2015 से चल रहा है अदालत का विवाद
इस पूरे विवाद की जड़ साल 2015 तक जाती है। उस समय दक्षिणपंथी और राष्ट्रीय रूढ़िवादी पार्टी Law and Justice यानी PiS की सरकार सत्ता में आई थी। सरकार ने संवैधानिक न्यायाधिकरण में न्यायाधीशों की नियुक्तियों में तेजी दिखाई, जिससे अदालत में उसका बहुमत मजबूत हो सके। पोलैंड का संवैधानिक न्यायाधिकरण बेहद अहम संस्था है, क्योंकि यह तय कर सकता है कि देश में बनाया गया कोई कानून संविधान के अनुरूप है या नहीं। इसलिए अदालत में न्यायाधीशों की नियुक्ति का सीधा असर सरकार के फैसलों पर पड़ सकता है।
PiS के दौर की नियुक्तियों पर उठे सवाल
PiS सरकार के कार्यकाल में न्यायपालिका पर राजनीतिक नियंत्रण बढ़ाने के आरोप लगे। पोलैंड के आलोचकों के साथ यूरोपीय संघ की संस्थाओं ने भी संवैधानिक न्यायाधिकरण में हुई नियुक्तियों पर सवाल उठाए। यूरोपियन कोर्ट ऑफ ह्यूमन राइट्स और कोर्ट ऑफ जस्टिस ऑफ द यूरोपियन यूनियन ने फैसला दिया कि PiS के बहुमत वाले दौर में चुने गए तीन न्यायाधीशों की नियुक्ति सही तरीके से नहीं हुई थी, क्योंकि उन पदों पर पिछली संसद पहले ही वैध नियुक्तियां कर चुकी थी।
राजनीतिक टकराव ने बढ़ाई चिंता
मौजूदा विवाद इसी पुराने न्यायिक और राजनीतिक टकराव की अगली कड़ी के तौर पर सामने आया है। अदालत के अध्यक्ष पर कार्रवाई, प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच झड़प तथा राष्ट्रपति का विदेश दौरा बीच में छोड़कर लौटना इस संकट की गंभीरता को दिखाता है। हालांकि, घटनाक्रम को सीधे “तख्तापलट की कोशिश” कहना अभी विवादित राजनीतिक व्याख्या है; उपलब्ध जानकारी के अनुसार मामला मुख्य रूप से सरकार और न्यायपालिका के अधिकारों को लेकर चल रहे टकराव से जुड़ा है।
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