सुप्रीम कोर्ट ने इंडियन रेलवे से “सेकंड-क्लास पैसेंजर” शब्द का इस्तेमाल बंद करने को कहा है। कोर्ट का कहना है कि यह शब्द पुराना है, औपनिवेशिक दौर के वर्गीकरण पर आधारित है और समानता व सम्मान के संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ है।
ट्रेन में बहुत ज़्यादा भीड़ के कारण हुए एक जानलेवा हादसे से जुड़े मामले की सुनवाई करते हुए, बेंच ने कहा कि यात्रियों की पहचान ऊंच-नीच दिखाने वाले लेबल से नहीं की जानी चाहिए। इसके बजाय, सिर्फ़ रेलवे कोच का वर्गीकरण किया जाना चाहिए, जैसे “सेकंड-क्लास कोच,” न कि यह दर्जा व्यक्तियों से जोड़ा जाए। कोर्ट ने सुझाव दिया कि रेलवे टिकट, मैनुअल और आधिकारिक रिकॉर्ड से “सेकंड-क्लास पैसेंजर” शब्द हटा दिया जाए।
ट्रेन में भीड़ की समस्या से निपटने पर ज़ोर
शब्दावली पर अपनी टिप्पणियों के साथ-साथ, सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि इंडियन रेलवे को ट्रेनों में भीड़ की समस्या से निपटने के लिए और मज़बूत व असरदार कदम उठाने चाहिए।
बेंच ने कहा कि बहुत ज़्यादा भीड़ यात्रियों की सुरक्षा और आराम से समझौता करती है, और कहा कि ऐसी दुखद घटनाओं को रोकने के लिए इस मुद्दे पर तुरंत प्रशासनिक ध्यान देने की ज़रूरत है।
मामला ट्रेन के एक जानलेवा हादसे से जुड़ा था
ये टिप्पणियां एक ऐसी याचिका पर सुनवाई के दौरान की गईं जो एक ऐसे व्यक्ति की विधवा ने दायर की थी, जिसकी मौत बहुत ज़्यादा भीड़ वाली ट्रेन से गिरने के बाद हो गई थी।
परिवार को मुआवज़ा मिलने का हकदार मानते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने मृतक यात्री की विधवा को ₹8 लाख देने का आदेश दिया और सुरक्षित यात्रा की स्थिति सुनिश्चित करने के लिए सरकारी अधिकारियों की ज़िम्मेदारी पर ज़ोर दिया।
कोर्ट ने समानता और सम्मान पर ज़ोर दिया
बेंच ने कहा कि इंडियन रेलवे जैसे सार्वजनिक संस्थानों को भाषा और व्यवहार दोनों में समानता और सम्मान के संवैधानिक सिद्धांतों का पालन करना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि यात्रियों के बीच ऊंच-नीच पैदा करने वाली शब्दावली आधुनिक संवैधानिक मूल्यों के अनुकूल नहीं है और इसे ज़्यादा समावेशी भाषा से बदला जाना चाहिए।
रेलवे से नीतिगत बदलावों पर विचार करने की उम्मीद
हालांकि कोर्ट की टिप्पणियां सलाह के तौर पर हैं, लेकिन उम्मीद है कि भविष्य की रेलवे नीति तय करने में इनका काफ़ी महत्व होगा। इंडियन रेलवे को लंबे समय से भीड़ की समस्या, खासकर जनरल और सेकंड-क्लास कोच में, आलोचना का सामना करना पड़ा है। ताज़ा टिप्पणियों से यात्री सुरक्षा, बुनियादी ढांचे में सुधार और पूरे रेलवे नेटवर्क में ज़्यादा समावेशी शब्दावली अपनाने पर चल रही चर्चाओं को और गति मिलने की संभावना है।
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