जम्मू-कश्मीर के कठुआ रेलवे स्टेशन का नाम बदल दिया गया है। अब यह स्टेशन ‘शहीद कैप्टन सुनील कुमार चौधरी रेलवे स्टेशन, कठुआ’ के नाम से जाना जाएगा। केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने इसकी जानकारी देते हुए कहा कि स्थानीय लोगों और शहीद के परिजनों की लंबे समय से चली आ रही मांग को स्वीकार करते हुए यह फैसला लिया गया है। उन्होंने बताया कि जिस तरह ऊधमपुर रेलवे स्टेशन का नाम शहीद कैप्टन तुषार महाजन के नाम पर रखा गया था, उसी तरह कठुआ रेलवे स्टेशन का नाम भी अब शहीद कैप्टन सुनील कुमार चौधरी के सम्मान में रखा गया है।
सेना में शामिल होने से पहले किया था MBA
कैप्टन सुनील कुमार चौधरी का जन्म 22 जून 1980 को जम्मू-कश्मीर के कठुआ जिले में हुआ था। उनके पिता पी.एल. चौधरी भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट कर्नल रहे। उन्होंने केंद्रीय विद्यालय से स्कूली शिक्षा पूरी की और इसके बाद पुणे के गरवारे कॉलेज ऑफ कॉमर्स से स्नातक किया। बाद में उन्होंने सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय से एमबीए की पढ़ाई शुरू की। हालांकि, सेना में जाने के अपने सपने को पूरा करने के लिए उन्होंने एमबीए बीच में छोड़ दिया और 1 जुलाई 2003 को भारतीय सैन्य अकादमी (IMA) में प्रवेश लिया।
कैप्टन मनोज पांडे से प्रेरित होकर चुनी गोरखा राइफल्स
कैप्टन सुनील कुमार चौधरी के छोटे भाई अंकुर चौधरी राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (NDA) में प्रशिक्षण ले रहे थे। वहीं कैप्टन मनोज कुमार पांडे की प्रतिमा और उनके शौर्य से प्रेरित होकर सुनील ने सेना में करियर बनाने का फैसला किया। 10 दिसंबर 2004 को IMA से पास आउट होने के बाद उन्होंने अपनी इच्छा से 11 गोरखा राइफल्स को चुना और फरवरी 2005 में इस रेजिमेंट में शामिल हुए। बाद में उन्हें असम के तिनसुकिया जिले में यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम (ULFA) के खिलाफ चल रहे काउंटर-इंसर्जेंसी ऑपरेशन में तैनात किया गया।
बहादुरी से लड़े और सर्वोच्च वीरता सम्मानों से हुए सम्मानित
असम में अभियान के दौरान कैप्टन सुनील कुमार चौधरी ने ULFA के दो कमांडरों को मार गिराया। उनकी बहादुरी के लिए 26 जनवरी 2008 को उन्हें सेना मेडल से सम्मानित किया गया। इसके अगले ही दिन, 27 जनवरी 2008 को रंगागढ़ गांव में छिपे उग्रवादियों के खिलाफ अभियान के दौरान उन्होंने एक हमलावर दल का नेतृत्व किया। ऑपरेशन के दौरान उनकी छाती में गोली लगी, लेकिन घायल होने के बावजूद उन्होंने लड़ाई जारी रखी और दो उग्रवादियों को मार गिराया। इस अभियान में वह वीरगति को प्राप्त हुए। देश के प्रति उनके सर्वोच्च बलिदान और अदम्य साहस के लिए उन्हें मरणोपरांत कीर्ति चक्र से सम्मानित किया गया। अब उनके सम्मान में कठुआ रेलवे स्टेशन का नाम भी उनके नाम पर रखा गया है।
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