Shri Jagannath Rath Yatra 2026: श्री जगन्नाथ रथ यात्रा का शुभारंभ 16 जुलाई, गुरुवार से होने जा रहा है। इस दौरान भगवान जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र और छोटी बहन सुभद्रा के साथ श्रीमंदिर से रथ पर सवार होकर गुंडिचा मंदिर के लिए प्रस्थान करते हैं। मान्यता है कि यह यात्रा भगवान के अपनी मौसी से मिलने जाने का प्रतीक है। गुंडिचा मंदिर में सात दिन रहने के बाद भगवान जगन्नाथ फिर से श्रीमंदिर लौटते हैं। भगवान के इस वार्षिक नगर भ्रमण से जुड़ी मौसी की पहचान को लेकर दो प्रमुख धार्मिक कथाएं प्रचलित हैं।
रानी गुंडिचा कैसे बनीं भगवान की मौसी?
पहली कथा के अनुसार, ओडिशा के तत्कालीन राजा इंद्रद्युम्न ने श्रीमंदिर बनवाया था, लेकिन उसमें भगवान की मूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा के लिए योग्य पुरोहित नहीं मिल रहे थे। तब नारद जी ने उन्हें बताया कि केवल ब्रह्मा जी ही यह काम कर सकते हैं। जब राजा ब्रह्मलोक जाने लगे तो नारद जी ने कहा कि वहां से लौटने तक पृथ्वी पर कई युग बीत जाएंगे। ऐसे में रानी गुंडिचा ने समाधि लेकर तप करने का संकल्प लिया और राजा ब्रह्मलोक के लिए रवाना हो गए।
कई युग बाद हुआ पुनर्मिलन
जब राजा इंद्रद्युम्न ब्रह्मा जी के साथ वापस लौटे तो कई युग बीत चुके थे और श्रीमंदिर रेत में दब चुका था। उस समय पुरी पर राजा गालु माधव का शासन था। राजा इंद्रद्युम्न ने उन्हें मंदिर का पूरा इतिहास बताया, जिसके बाद खुदाई कर गर्भगृह खोजा गया। इसी बीच रानी गुंडिचा की समाधि भी टूटी और वह मंदिर पहुंचीं, जहां उनका राजा इंद्रद्युम्न से पुनर्मिलन हुआ। इस घटना से राजा गालु माधव को पूरी सच्चाई का प्रमाण मिल गया।
भगवान ने दिया हर साल मिलने का वचन
इसके बाद ब्रह्मा जी ने भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियों की विधि-विधान से प्राण प्रतिष्ठा कराई। इससे प्रसन्न होकर भगवान जगन्नाथ ने राजा इंद्रद्युम्न को वरदान दिए और रानी गुंडिचा से कहा कि उन्होंने मां के समान उनकी प्रतीक्षा की है, इसलिए वह उनकी मौसी हैं। भगवान ने यह भी वचन दिया कि वह हर वर्ष उनसे मिलने आएंगे। मान्यता है कि जिस स्थान पर रानी गुंडिचा ने तप किया था, वहीं बाद में गुंडिचा मंदिर का निर्माण हुआ। भगवान जगन्नाथ आज भी अपनी इसी प्रतिज्ञा का पालन करते हुए हर साल सात दिनों के लिए गुंडिचा मंदिर जाते हैं। पूरे साल में केवल इन्हीं सात दिनों के दौरान वहां नियमित पूजा होती है।
पुरी की मौसी मां अर्धशोषणी की कथा
दूसरी मान्यता पुरी स्थित देवी अर्धशोषणी, जिन्हें अर्धासिनी भी कहा जाता है, से जुड़ी है। उन्हें भी भगवान जगन्नाथ की मौसी माना जाता है। स्कंद पुराण के अनुसार, एक बार पुरी में समुद्र का जल स्तर इतना बढ़ गया कि श्रीमंदिर पर संकट मंडराने लगा। तब देवी अर्धासिनी ने बाढ़ का आधा पानी पी लिया, जिससे मंदिर सुरक्षित बच गया। इसी कारण उन्हें पुरी की संरक्षक देवी भी माना जाता है।
जब मौसी ने कराया भगवान का सत्कार
एक दूसरी कथा के अनुसार, एक बार लक्ष्मी जी किसी वजह से नाराज होकर अपने मायके चली गईं। इसके बाद श्रीमंदिर में अन्न और ऐश्वर्य की कमी हो गई, जिससे भगवान जगन्नाथ और बलभद्र को भोजन के लिए भिक्षा मांगनी पड़ी। वहीं छोटी बहन सुभद्रा अपनी मौसी देवी अर्धशोषणी के घर चली गईं। वहां देवी ने सुभद्रा की मां की तरह देखभाल की। इसी परंपरा के तहत रथ यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ का रथ देवी अर्धशोषणी के मंदिर के सामने रुकता है, जहां मौसी उन्हें पोड़ा पीठा का भोग अर्पित करती हैं।
दो मान्यताएं, एक आस्था
श्री जगन्नाथ रथ यात्रा केवल भगवान के नगर भ्रमण का त्यौहार नहीं है, बल्कि यह रिश्तों, वचन और भक्ति का भी प्रतीक माना जाता है। चाहे रानी गुंडिचा की कथा हो या देवी अर्धशोषणी की, दोनों मान्यताएं इस बात को दर्शाती हैं कि भगवान जगन्नाथ हर साल अपनी मौसी से मिलने जरूर जाते हैं और इसी परंपरा को रथ यात्रा के रूप में श्रद्धापूर्वक निभाया जाता है।
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