Garuda Puran Facts: इस दुनिया में यदि कुछ होना निश्चित है तो वो मृत्यु है। मृत्यु जीवन का एक ऐसा सत्य है जिसे इंसान चाहकर भी नकार नहीं सकता और एक न एक दुनिया छोड़ ही देता है। हिंदू धर्म में मृत्यु को ही जीवन का अंतिम सत्य माना गया है। इंसान के मर जाने के बाद किए जाने वाले अंतिम संस्कार केवल धार्मिक प्रक्रिया नहीं माने जाते, बल्कि इन्हें आत्मा की आगे की यात्रा से भी जोड़ा जाता है। इन्हीं नियमों में एक ऐसी परंपरा भी है, जिसे लगभग हर किसी ने देखा है, लेकिन उसके पीछे का कारण बहुत कम लोग जानते हैं। अंतिम संस्कार से पहले मृतक के नाक और कान में रुई लगाने की प्रथा सदियों से चली आ रही है।
गरुड़ पुराण में शरीर के नौ द्वारों का क्या है मतलब?
हिन्दू धार्मिक ग्रंथ गरुड़ पुराण में मृत्यु, आत्मा और अंतिम संस्कार से जुड़े कई नियमों के बारे में विस्तार से बताया गया है। सनातन परंपरा के अनुसार मानव शरीर को नौ द्वारों वाला माना गया है। इनमें दो आंखें, दो कान, दो नथुने, मुंह और शरीर के अन्य मार्ग शामिल हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मृत्यु के बाद आत्मा शरीर का त्याग करती है और इन द्वारों का आध्यात्मिक महत्व माना जाता है।
नाक और कान में रुई लगाने की धार्मिक मान्यता
कई धार्मिक परंपराओं में माना जाता है कि मृत्यु के बाद शरीर के खुले अंगों को सुरक्षित रखना आवश्यक होता है। अंतिम संस्कार की तैयारियों के दौरान कुछ स्थानों पर मृतक के पास तुलसी के पत्ते या सोने जैसी पवित्र वस्तुएं रखने की परंपरा भी निभाई जाती है। मान्यता है कि तुलसी मोक्ष और पवित्रता का प्रतीक है, जबकि सोना शुभता और शुद्धता से जुड़ा माना जाता है। नाक और कान में रुई लगाने से इन वस्तुओं के बाहर गिरने की संभावना कम हो जाती है।
आत्मा की यात्रा से जुड़ा विश्वास
हिंदू मान्यताओं के अनुसार मृत्यु के तुरंत बाद आत्मा का शरीर से मोह पूरी तरह समाप्त नहीं होता। हिन्दू धार्मिक कथाओं में बताया गया है कि आत्मा को अपने नए मार्ग की ओर आगे बढ़ना होता है और अंतिम संस्कार की प्रक्रिया इस यात्रा को सुगम बनाने का माध्यम मानी जाती है। इसी वजह से शरीर के खुले द्वारों को बंद करने की परंपरा विकसित हुई। हालांकि यह पूरी तरह आस्था और धार्मिक विश्वास का विषय है तथा विभिन्न समुदायों में इसकी मान्यताएं अलग-अलग हो सकती हैं।
नकारात्मक प्रभावों से सुरक्षा का प्रतीक
कुछ प्राचीन धार्मिक मान्यताओं में यह भी कहा गया है कि मृत्यु के बाद शरीर निष्क्रिय हो जाता है और उसकी ऊर्जा समाप्त हो जाती है। ऐसे में शरीर की सुरक्षा के लिए कई प्रतीकात्मक उपाय किए जाते हैं। नाक और कान में रुई लगाना भी इन्हीं परंपराओं का हिस्सा माना जाता है। इसे अशुभ या नकारात्मक प्रभावों से बचाव के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।
क्या कहता है विज्ञान?
धार्मिक मान्यताओं के अलावा इसके पीछे व्यावहारिक और वैज्ञानिक कारण भी बताए जाते हैं। मृत्यु के बाद शरीर में प्राकृतिक परिवर्तन शुरू हो जाते हैं और अपघटन की प्रक्रिया धीरे-धीरे आगे बढ़ती है। इस दौरान शरीर के कुछ तरल पदार्थ नाक, कान या अन्य मार्गों से बाहर आ सकते हैं। ऐसे में रुई लगाने से इन स्रावों को नियंत्रित करने में मदद मिलती है और शव को अंतिम संस्कार तक व्यवस्थित स्थिति में रखा जा सकता है।
पुराने समय के अनुभवों से जुड़ी परंपरा
एक्सपर्ट्स के अनुसार पुराने समय में आधुनिक चिकित्सा सुविधाएं और शव संरक्षण की व्यवस्थाएं सीमित थीं। इसलिए लोगों ने अनुभव के आधार पर ऐसे उपाय अपनाए, जो शव को सम्मानजनक स्थिति में बनाए रखने में सहायक हों। समय के साथ ये उपाय धार्मिक परंपराओं का हिस्सा बन गए।
Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं। mhone News इनकी पुष्टि नहीं करता है। इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें।
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