तमिलनाडु की राजनीति में एक बड़ा राजनीतिक उलटफेर सामने आया है। राज्य के मौजूदा CM और डीएमके प्रमुख एम. के. स्टालिन को कोलाथुर विधानसभा सीट से हार का सामना करना पड़ा है। यह सीट लंबे समय से उनका मजबूत गढ़ मानी जाती थी, जहां से वे लगातार तीन बार जीत हासिल कर चुके थे। इस बार उन्हें थलापति विजय की पार्टी तमिलगा वेत्री कड़गम (TVK) के उम्मीदवार वी.एस. बाबू ने शिकस्त दी है, जिससे राज्य की सियासत में नई चर्चा शुरू हो गई है।
स्टालिन का मजबूत किला ढहा
कोलाथुर सीट को स्टालिन का अभेद्य किला माना जाता था। 2011, 2016 और 2021 के चुनावों में उन्होंने यहां से लगातार जीत दर्ज की थी। 2021 में उन्होंने AIADMK के उम्मीदवार को हराकर अपनी स्थिति और मजबूत की थी, लेकिन इस बार परिणाम पूरी तरह उलट गए।
पूर्व सहयोगी ने दी कड़ी टक्कर
वी.एस. बाबू, जिन्होंने स्टालिन को हराया, कभी उनके करीबी माने जाते थे। वे पहले डीएमके से जुड़े थे और 2011 में स्टालिन के चुनाव प्रबंधन में भी अहम भूमिका निभा चुके थे। बाद में उन्होंने पार्टी छोड़कर AIADMK का रुख किया और फिर 2026 में विजय थलपति की पार्टी TVK में शामिल हो गए। उनकी इस जीत को राजनीतिक तौर पर काफी अहम माना जा रहा है, क्योंकि उन्होंने अपने ही पुराने नेता को उनके गढ़ में हराया है।
राजनीतिक विरासत पर असर
एम. के. स्टालिन तमिलनाडु की राजनीति के बड़े चेहरों में से एक हैं और पूर्व मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि के बेटे हैं। 2018 में पिता के निधन के बाद उन्होंने डीएमके की कमान संभाली थी। कोलाथुर सीट 2011 में बनाई गई थी और तब से लेकर अब तक इस सीट पर स्टालिन का ही कब्जा रहा था। ऐसे में इस हार को उनकी राजनीतिक पकड़ के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। यह नतीजा न सिर्फ डीएमके के लिए, बल्कि तमिलनाडु की पूरी राजनीति के लिए एक बड़ा संकेत माना जा रहा है, जहां नए राजनीतिक समीकरण बनते दिखाई दे रहे हैं।
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