पश्चिम बंगाल(West Bengal) में चुनावों का इतिहास लंबे समय तक राजनीतिक हिंसा से जुड़ा रहा है। 1960 के दशक के उथल-पुथल भरे दौर से लेकर हाल के वर्षों तक चुनावी प्रक्रिया के दौरान टकराव, हमले और जान-माल का नुकसान आम बात मानी जाती रही है। अलग-अलग दलों के बीच वर्चस्व की लड़ाई ने राज्य की चुनावी संस्कृति को गहराई से प्रभावित किया जहां विरोधियों को दबाने की कोशिशें अक्सर हिंसक रूप ले लेती थीं।
हालांकि, 2026 के विधानसभा चुनावों ने इस तस्वीर को बदलने का संकेत दिया है। इस बार न तो किसी की जान गई और न ही गंभीर रूप से घायल होने की कोई घटना सामने आई। यह बदलाव राज्य के पिछले रिकॉर्ड को देखते हुए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
क्या कहते हैं आंकड़े ?
अगर पिछले आंकड़ों की बात की जाए तो, लगभग हर बड़े चुनाव में हिंसा और मौतें दर्ज होती रही हैं।
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2006 के विधानसभा चुनाव में 5 लोगों की जान गई थी।
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2008 के पंचायत चुनाव में यह संख्या बढ़कर 45 हो गई।
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2009 के लोकसभा चुनाव में 15 मौतें दर्ज की गईं।
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2011 के विधानसभा चुनाव में 17 लोगों की जान गई।
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2013 के पंचायत चुनाव में 20 मौतें हुईं।
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2014 के लोकसभा चुनाव में 7 लोगों की मौत हुई।
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2016 के विधानसभा चुनाव में 8 लोगों की जान गई।
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2018 के पंचायत चुनाव सबसे ज्यादा हिंसक रहे, जिनमें 75 लोगों की मौत हुई।
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2019 के लोकसभा चुनाव में 12 मौतें दर्ज हुईं।
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2021 के विधानसभा चुनाव में 17 लोगों की जान गई।
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2023 के पंचायत चुनाव में 57 मौतें हुईं।
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2024 के लोकसभा चुनाव में 6 लोगों की मौत दर्ज की गई।

