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बच्चा गोद लेने वाली हर मां को मिलेगी मैटरनिटी लीव, अडॉप्शन पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने बच्चा गोद लेने वाली महिलाओं के अधिकारों को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है, जिसमें कहा गया है कि बच्चा गोद लेने वाली हर महिला को 12 हफ्ते की मैटरनिटी लीव मिलेगी, चाहे बच्चे की उम्र कुछ भी हो। अदालत ने उस प्रावधान को निरस्त कर दिया है, जिसमें केवल तीन महीने तक के बच्चे को गोद लेने पर ही यह सुविधा दी जाती थी।

समानता के अधिकार का उल्लंघन 

जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि बच्चे की उम्र के आधार पर मातृत्व अवकाश तय करना न तो तर्कसंगत है और न ही न्यायसंगत। यह समानता के अधिकार का उल्लंघन है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब कोई महिला किसी बच्चे को कानूनी रूप से गोद लेती है या उसे बच्चा सौंपा जाता है, तो उसी दिन से उसे 12 हफ्तों का अवकाश मिलना चाहिए।

सभी को समान अधिकार 

अदालत ने अपने निर्णय में यह भी कहा कि गोद लेने के बाद मां की जिम्मेदारियां हर परिस्थिति में समान रहती हैं, फिर चाहे बच्चा छोटा हो या बड़ा। ऐसे में उम्र के आधार पर भेदभाव करना गलत है। कोर्ट के इस फैसले से अब सभी बच्चा गोद लेने वाली महिलाओं को समान अधिकार मिलेगा और उन्हें अपने बच्चे के साथ शुरुआती समय बिताने का अवसर मिलेगा।

कानूनी प्रावधान पर उठे सवाल

यह मामला साल 2021 में दायर एक याचिका से जुड़ा है, जिसमें मैटरनिटी बेनिफिट (संशोधन) अधिनियम, 2017 की धारा 5(4) को चुनौती दी गई थी। इस धारा के तहत कामकाजी महिलाओं को केवल तभी 12 हफ्ते की छुट्टी मिलती थी, जब वे तीन महीने या उससे कम उम्र के बच्चे को गोद लें। इस प्रावधान को बाद में सोशल सिक्योरिटी कोड, 2020 में भी शामिल किया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक बताते हुए रद्द कर दिया।

पितृत्व अवकाश पर भी टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से यह भी कहा है कि पितृत्व अवकाश को भी सामाजिक सुरक्षा के रूप में मान्यता देने के लिए कानून बनाया जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि बच्चे के पालन-पोषण में माता-पिता दोनों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है, इसलिए छुट्टियों की व्यवस्था भी उनकी जरूरतों के अनुसार होनी चाहिए।

महिलाओं के लिए राहत भरी खबर 

इस फैसले को बच्चा गोद लेने वाली महिलाओं के लिए एक बड़ी राहत के रूप में देखा जा रहा है। इससे उन्हें अपने बच्चे के साथ बेहतर तरीके से समय बिताने और उसकी देखभाल करने का अवसर मिलेगा। साथ ही यह निर्णय कार्यस्थल पर समानता और सामाजिक न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

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