गुजरात के मेहसाणा जिले से एक ऐसी कहानी सामने आई है जो इंसान और प्रकृति के रिश्ते को बेहद खूबसूरत तरीके से दर्शाती है। यहां एक रिटायर्ड शिक्षक दंपति ने अपने रिटायरमेंट को आराम या निजी जीवन तक सीमित रखने के बजाय प्रकृति और पक्षियों की सेवा में समर्पित कर दिया। इस जोड़े ने न केवल अपनी जमीन को पक्षियों के लिए सुरक्षित स्थान बनाया बल्कि अपनी जीवनभर की बचत भी इस नेक काम में लगा दी।
यह प्रेरणादायक कहानी मेहसाणा के बहुचराजी के पास स्थित धानोरा गांव की है। यहां रहने वाले इस शिक्षक दंपति ने रिटायरमेंट के बाद अपने समय को खाली बैठकर बिताने के बजाय एक ऐसा काम चुना जो समाज के साथ-साथ पर्यावरण के लिए भी मिसाल बन गया। उन्होंने अपनी उपजाऊ जमीन पर एक प्राकृतिक आवास तैयार किया जिसे बाद में एक छोटे बर्ड सेंचुरी(bird sanctuary) के रूप में विकसित किया गया।
बिना सरकारी मदद के बना “निसर्ग निकेतन फार्म”
इस पूरी परियोजना की खास बात यह है कि इसे किसी भी सरकारी ग्रांट या बाहरी फंडिंग के बिना तैयार किया गया है। दंपति ने अपने निजी संसाधनों और मेहनत के दम पर इसे खड़ा किया है। उन्होंने इस जगह का नाम “निसर्ग निकेतन फार्म” रखा जहां प्रकृति और जीव-जंतुओं के लिए अनुकूल माहौल तैयार किया गया है। यह फार्म आज एक ऐसे स्थान के रूप में पहचान बना चुका है जहां पक्षियों को खुला और सुरक्षित वातावरण मिलता है।
इस दंपति ने अपनी जमीन को पक्षियों के लिए अनुकूल बनाने के लिए कई सालों तक लगातार काम किया। यहां उन्होंने बड़े पैमाने पर पेड़-पौधे लगाए खासकर फलदार और घने वृक्ष, ताकि पक्षियों को न सिर्फ भोजन मिले बल्कि घोंसला बनाने और छिपने की भी सुरक्षित जगह मिल सके। इसके साथ ही फार्म में विशेष “फीडिंग जोन” बनाए गए हैं जहां पक्षियों के लिए नियमित रूप से दाने-पानी की व्यवस्था की जाती है। छोटे-छोटे जलकुंड और प्राकृतिक जल स्रोत भी तैयार किए गए हैं ताकि गर्मी या सूखे के समय भी पक्षियों को कोई परेशानी न हो।
300 से अधिक मोरों को मिला घर
इस प्रयास का सबसे सुंदर परिणाम यह है कि आज यहां 300 से ज्यादा मोर खुले वातावरण में बिना किसी डर के रहते हैं। यह स्थान अब उनके लिए एक स्थायी आवास बन चुका है जहां वे दिनभर स्वतंत्र रूप से विचरण करते हैं। आसपास का शांत और हरियाली से भरा माहौल उन्हें प्राकृतिक जीवन जीने का पूरा अवसर देता है।
इस रिटायर्ड शिक्षक दंपति की यह पहल यह साबित करती है कि अगर इरादे मजबूत हों तो बड़े बदलाव लाना मुश्किल नहीं होता। उन्होंने यह दिखाया है कि पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारी योजनाओं पर निर्भर नहीं है बल्कि व्यक्तिगत प्रयास भी बड़ा असर डाल सकते हैं।