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50 पैसे प्रति किलो प्याज बेचने को मजबूर किसान, महाराष्ट्र के किसानो का क़र्ज़ कैसे होगा कम?

महाराष्ट्र के प्याज उत्पादक बेल्ट से किसानों की बदहाली की ऐसी तस्वीरें सामने आई हैं, जो कृषि संकट की भयावहता को दर्शाती हैं। नासिक के सटाना तालुका में एक किसान को अपनी खून-पसीने की कमाई का दाम मात्र 50 पैसे प्रति किलोग्राम मिला। सटाना कृषि उपज मंडी समिति (APMC) पहुंचे किसान जितेंद्र सोलंके को उम्मीद थी कि फसल बेचकर कम से कम लागत तो निकल आएगी, लेकिन मंडी में मिले दाम ने उनकी कमर तोड़ दी। सोलंके ने 1.5 एकड़ में प्याज उगाने के लिए स्थानीय साहूकार से एक लाख रुपये उधार लिए थे, लेकिन 100 क्विंटल फसल बेचने के बाद उन्हें केवल 15,000 रुपये ही मिल सके। अब उन पर 85,000 रुपये का कर्ज और ब्याज का भारी बोझ बाकी है।

 

मंडी में बेबस होता किसान

किसानों की इस दुर्दशा पर मंडी प्रशासन की बेरुखी भी साफ नजर आ रही है। जितेंद्र सोलंके के अनुसार, जब उन्होंने कम दाम मिलने की शिकायत APMC अधिकारियों से की, तो उन्होंने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि वे व्यापारियों के दाम तय करने में दखल नहीं दे सकते। हैरानी की बात यह है कि इसी मंडी में महज छह दिन पहले प्याज 3.50 रुपये प्रति किलो बिक रहा था। बेमौसम बारिश की मार झेल चुके सोलंके का कहना है कि अगर सरकार ने कम से कम 20 रुपये का न्यूनतम दाम तय नहीं किया, तो किसानों के पास आत्महत्या के अलावा कोई रास्ता नहीं बचेगा।

फसल बेची और जेब से देने पड़े पैसे

संकट की सबसे मार्मिक तस्वीर छत्रपति संभाजीनगर से सामने आई है, जहाँ पैठण तालुका के किसान प्रकाश गलाधर के साथ जो हुआ, उसने सबको झकझोर दिया। गलाधर अपनी 25 बोरी प्याज (लगभग 1,262 किलो) लेकर मंडी पहुंचे थे। नीलामी में उनकी फसल 1 रुपये प्रति किलो के भाव बिकी, जिससे कुल कमाई 1,262 रुपये हुई। लेकिन जब व्यापारी ने ट्रांसपोर्ट, तुलाई, स्टोरेज और मजदूरी के खर्चे काटे, तो किसान की पूरी कमाई शून्य हो गई। उलटे गलाधर को व्यापारी को 1 रुपया अपनी जेब से देना पड़ गया। यह रसीद अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही है और सरकारी दावों की पोल खोल रही है।

कर्ज के दलदल में डूबता परिवार

किसानों की यह पीड़ा सिर्फ एक सीजन की नहीं, बल्कि पीढ़ियों के संघर्ष की है। प्रकाश गलाधर पहले ही अपनी बेटी की शादी के लिए लिए गए 5 लाख रुपये के कर्ज से दबे हुए हैं। प्याज की फसल से उन्हें कर्ज चुकाने की उम्मीद थी, लेकिन अब स्थिति और भी गंभीर हो गई है। हताशा में उन्होंने अपनी बाकी बची फसल को फेंकने का फैसला किया, क्योंकि उसे मंडी तक लाने का खर्च भी फसल की कीमत से ज्यादा बैठ रहा है। किसानों की मांग है कि सरकार तत्काल इस मामले में हस्तक्षेप करे ताकि कृषि का यह आर्थिक ढांचा पूरी तरह ध्वस्त होने से बच सके।

 

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