महाशिवरात्रि भगवान शिव की उपासना का अत्यंत पवित्र और महत्त्वपूर्ण पर्व माना जाता है। इस दिन देशभर में शिवभक्त उपवास रखते हैं, रात्रि जागरण करते हैं और विधि-विधान से शिवलिंग का अभिषेक करते हैं।
मान्यता है कि इस पावन रात्रि में सच्ची श्रद्धा और समर्पण के साथ की गई पूजा से भगवान शिव शीघ्र प्रसन्न होते हैं और भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। शास्त्रों और पुराणों के मुताबिक कुछ वस्तुएं शिवपूजा में वर्जित मानी गई हैं। यदि अनजाने में भी इनका प्रयोग कर लिया जाए तो पूजा का पूर्ण फल नहीं मिल पाता।
शिवलिंग पर नहीं अर्पित की जाती तुलसी
हिंदू धर्म में तुलसी को अत्यंत पवित्र माना गया है और विशेष रूप से भगवान विष्णु की पूजा में इसका महत्वपूर्ण स्थान है। लेकिन शिवलिंग पर तुलसी चढ़ाना निषिद्ध बताया गया है। पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान शिव ने तुलसी के पति असुर जालंधर का वध किया था। इस घटना के बाद तुलसी ने शिव पूजा से स्वयं को अलग कर लिया। इसी कारण शिव आराधना में तुलसी का उपयोग नहीं किया जाता।
नहीं चढ़ाए जाते कुमकुम और सिंदूर
कुमकुम और सिंदूर को स्त्री शक्ति और श्रृंगार का प्रतीक माना जाता है, जबकि भगवान शिव त्याग, वैराग्य और तपस्या के प्रतीक हैं। इसी वजह से शिवलिंग पर सिंदूर, रोली या कुमकुम अर्पित करना वर्जित माना गया है। शिवपूजा में इनकी बजाय भस्म और चंदन का प्रयोग अधिक शुभ और शास्त्रसम्मत माना जाता है।
शिवलिंग पर हल्दी चढ़ाना होता है वर्जित ?
हल्दी का संबंध भी शुभ कार्यों और विवाह संस्कारों से जुड़ा हुआ है। इसे सौभाग्य और स्त्री तत्व का प्रतीक माना जाता है। चूंकि शिवलिंग को पुरुष तत्व का प्रतीक माना गया है, इसलिए शिवजी की आराधना में हल्दी का प्रयोग नहीं किया जाता। विशेषकर महाशिवरात्रि के दिन इस नियम का पालन करने की सलाह दी जाती है।
शिवपूजा में नहीं किया जाता शंख का उपयोग
आमतौर पर पूजा-पाठ में शंखनाद को मंगलकारी माना जाता है, लेकिन शिव आराधना में शंख का प्रयोग नहीं किया जाता। धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान शिव ने शंखचूड़ नामक दैत्य का संहार किया था और उसी के शरीर से शंख की उत्पत्ति हुई मानी जाती है। इस कारण शिव पूजा में शंख का उपयोग शुभ नहीं माना गया।
किन फूलों का होता है परहेज ?
भगवान शिव को बेलपत्र, धतूरा और भांग अत्यंत प्रिय माने जाते हैं। लेकिन केतकी का फूल, कनेर और विशेष रूप से लाल रंग के पुष्प शिवलिंग पर अर्पित नहीं किए जाते। कथा है कि केतकी ने एक प्रसंग में असत्य का साथ दिया था, जिससे क्रोधित होकर शिवजी ने उसे श्राप दे दिया। तभी से शिवपूजन में केतकी का प्रयोग वर्जित माना गया है।