देशभर के करोड़ों वाहन चालकों के लिए आने वाले समय में पेट्रोल भरवाने का अनुभव पूरी तरह बदल सकता है। केंद्र सरकार ऐसी व्यवस्था पर काम कर रही है जिसके तहत पेट्रोल पंपों पर ग्राहकों को अलग-अलग इथेनॉल मिश्रण(ethanol blend) वाले पेट्रोल का विकल्प दिया जाएगा। यानी अब वाहन मालिक अपनी गाड़ी की क्षमता और इंजन की जरूरत के हिसाब से फ्यूल चुन सकेंगे।
सरकार की इस नई योजना को “सुपरमार्केट-स्टाइल चॉइस” मॉडल की तरह देखा जा रहा है जहां ग्राहकों के सामने कई विकल्प उपलब्ध होंगे। इससे वाहन चालकों को अधिक सुविधा मिलने के साथ-साथ देश की ऊर्जा नीति को भी मजबूती मिलेगी।
पेट्रोल पंपों पर मिल सकते हैं कई फ्यूल विकल्प
सूत्रों के मुताबिक सरकार ने तेल कंपनियों को अलग-अलग इथेनॉल मिश्रण वाले ईंधन की तैयारी शुरू करने के निर्देश दिए हैं। इसमें E20, E22, E25 और E30 जैसे फ्यूल वेरिएंट शामिल हो सकते हैं। इन सभी में पेट्रोल के साथ इथेनॉल की मात्रा अलग-अलग होगी। इसके लिए पेट्रोल पंपों पर नए डिस्पेंसिंग सिस्टम और इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने की योजना बनाई जा रही है ताकि ग्राहक अपनी गाड़ी के अनुकूल फ्यूल आसानी से चुन सकें।
हाल ही में ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड्स (BIS) ने नए इथेनॉल मिश्रणों को लेकर नियमों पर काम शुरू किया है। इसके अलावा सरकार ने अप्रैल महीने में पूरी तरह इथेनॉल आधारित वाहनों को अनुमति देने का प्रस्ताव भी रखा था। माना जा रहा है कि इसी दिशा में यह अगला बड़ा कदम हो सकता है।
क्या है सरकार का मुख्य उद्देश्य?
भारत लंबे समय से पेट्रोल और डीजल के लिए विदेशी कच्चे तेल पर निर्भर रहा है। ऐसे में सरकार लगातार वैकल्पिक ईंधन को बढ़ावा देने की कोशिश कर रही है। इथेनॉल ब्लेंडिंग को बढ़ाने के पीछे सबसे बड़ा उद्देश्य तेल आयात को कम करना है। भारत पहले ही 20 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रण यानी E20 के लक्ष्य को हासिल कर चुका है।
अब सरकार अगले एक से दो वर्षों में इसे बढ़ाकर E25 और फिर E30 तक ले जाने की तैयारी कर रही है। यदि पेट्रोल में इथेनॉल की मात्रा बढ़ती है, तो देश को कच्चे तेल के आयात पर कम खर्च करना पड़ेगा। इससे विदेशी मुद्रा की बचत होगी और भारत की ऊर्जा सुरक्षा भी मजबूत होगी।
किसानों और चीनी उद्योग को होगा फायदा
इथेनॉल मुख्य रूप से गन्ने के रस, मक्के और खराब हो चुके अनाज से तैयार किया जाता है। ऐसे में इसकी मांग बढ़ने का सीधा लाभ किसानों को मिलेगा। सरकार और तेल कंपनियों को अधिक मात्रा में इथेनॉल खरीदना पड़ेगा जिससे कृषि उत्पादों की मांग बढ़ेगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि इससे गन्ना किसानों और चीनी मिलों की आर्थिक स्थिति बेहतर हो सकती है। किसानों को उनकी फसलों का बेहतर दाम मिलने की संभावना भी बढ़ेगी।