Uttarakhand : हरिद्वार-ऋषिकेश में अब गैर-हिन्दुओं के प्रवेश पर रोक! सरकार लाने वाली है ये नियम…
श्री गंगा सभा के अनुसार, धार्मिक स्थल, रीति-रिवाज और आस्था से जुड़े कार्यक्रम लगातार विवादों और चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। इसलिए, साफ़ और सख़्त नियम ज़रूरी हो गए हैं।
उत्तराखंड में प्रस्तावित अर्धकुंभ से पहले हरिद्वार और ऋषिकेश को पवित्र नगरी घोषित किए जाने की मांग ने जोर पकड़ लिया है। इसके साथ ही इन दोनों तीर्थ नगरों में स्थित लगभग 105 गंगा घाटों पर पूर्व में लागू रही धार्मिक व्यवस्थाओं को दोबारा लागू करने की मांग भी तेज हो गई है। प्रस्ताव के तहत हर की पैड़ी की तर्ज पर इन घाटों पर गैर-हिंदुओं के प्रवेश को प्रतिबंधित करने पर विचार किया जा रहा है।
सूत्रों के अनुसार, भविष्य में पूरे कुंभ क्षेत्र में यह व्यवस्था लागू कर उसे ‘सनातन पवित्र नगरी’ का स्वरूप देने का प्रस्ताव भी सामने आया है, जिस पर राज्य की धामी सरकार गंभीरता से मंथन कर रही है।
हरिद्वार-ऋषिकेश में पुरानी धार्मिक व्यवस्थाओं पर चर्चा तेज
हरिद्वार स्थित श्रीगंगा सभा के अध्यक्ष नितिन गौतम ने कहा कि यह मांग कोई नई नहीं है। उन्होंने बताया कि करीब एक सदी पहले ब्रिटिश शासन के दौरान जब हरिद्वार का योजनाबद्ध विकास किया गया था, तब नगर की व्यवस्थाएं स्थानीय धार्मिक परंपराओं और समाज की सहभागिता को ध्यान में रखकर तय की गई थीं। उसी समय गंगा घाटों की पवित्रता बनाए रखने के लिए विशेष नियम बनाए गए थे।
नितिन गौतम का कहना है कि यदि उस दौर में ऐसी व्यवस्थाओं की आवश्यकता महसूस की गई थी, तो वर्तमान समय में इसकी जरूरत कहीं अधिक बढ़ गई है। आज धार्मिक स्थलों और आस्था से जुड़े आयोजनों को लेकर लगातार विवाद सामने आ रहे हैं, ऐसे में स्पष्ट और कठोर नियम बनाना जरूरी हो गया है।
कुंभ क्षेत्र को ‘हिंदू क्षेत्र’ घोषित करने की मांग
श्रीगंगा सभा के अनुसार, पहले हरिद्वार में श्रद्धालुओं की संख्या लाखों में होती थी, लेकिन अब कुंभ और प्रमुख धार्मिक आयोजनों के दौरान करोड़ों श्रद्धालु गंगा तट पर पहुंचते हैं। इतनी विशाल भीड़ को देखते हुए बड़े संरक्षित क्षेत्र, घाटों की सुरक्षा और धार्मिक अनुष्ठानों की सुव्यवस्थित व्यवस्था बेहद जरूरी हो गई है। इसी कारण पूरे कुंभ क्षेत्र को ‘हिंदू क्षेत्र’ घोषित कर धार्मिक परंपराओं को संरक्षित करने की मांग उठ रही है।
सरकार को सौंपा गया प्रस्ताव
श्रीगंगा सभा के अध्यक्ष ने बताया कि इस मुद्दे पर राज्य सरकार और मुख्यमंत्री से कई चरणों में चर्चा हो चुकी है। हाल ही में अवैध धार्मिक ढांचों और अतिक्रमण के खिलाफ हुई कार्रवाई को उन्होंने सकारात्मक कदम बताया। साथ ही उन्होंने उम्मीद जताई कि गंगा घाटों से जुड़ा यह प्रस्ताव भी सरकार आगे बढ़ाएगी।
उन्होंने यह भी कहा कि नियमों के बावजूद कुछ लोग निजी स्वार्थ के चलते उनका उल्लंघन करते हैं और अवैध कॉलोनियों का निर्माण करते हैं, जिन पर कड़ी कानूनी कार्रवाई आवश्यक है। हर की पैड़ी पर गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर रोक का ऐतिहासिक आधार वर्ष 1916 के समझौते और 1935 के हरिद्वार म्युनिसिपल अधिनियम से जुड़ा है। पंडित मदन मोहन मालवीय के प्रयासों से ब्रिटिश सरकार ने हरिद्वार नगर पालिका अधिनियम 1916 के तहत घाटों की पवित्रता सुनिश्चित करने के प्रावधान शामिल किए थे।
बाद में 1935 के हरिद्वार नगर अधिनियम ने इन नियमों को और मजबूत किया, जिसमें गंगा की अविरल धारा और तीर्थ नगरी की पवित्रता बनाए रखने से जुड़े स्पष्ट प्रावधान दर्ज थे।
इन नियमों में शामिल था-
- गंगा घाटों पर गैर-हिंदुओं का प्रवेश निषेध
- नगर क्षेत्र में गैर-हिंदुओं के रात्रि प्रवास पर प्रतिबंध
- तीर्थ क्षेत्र में स्थायी बसावट पर रोक
अर्धकुंभ को लेकर बढ़ी हलचल
इसी क्रम में 105 गंगा घाटों का सर्वे कराया गया है और उनके पुनर्निर्माण की प्रक्रिया भी शुरू की जा रही है। यदि यह प्रस्ताव स्वीकृत होता है, तो हरिद्वार और ऋषिकेश को आधिकारिक रूप से ‘पवित्र नगरी’ का दर्जा मिल सकता है। इसके साथ ही घाटों पर कड़े नियम, रात्रि प्रवास और आचरण को लेकर नई गाइडलाइंस लागू होंगी। 2027 के अर्धकुंभ से पहले यह फैसला सरकार के लिए बेहद अहम माना जा रहा है।
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