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कपड़ा उद्योग के लिए बड़ी खुशखबरी! 31 दिसंबर तक विदेश से बिना कस्टम ड्यूटी मंगा सकेंगे कपास

भारतीय वस्त्र और गारमेंट उद्योग को बड़ी राहत देते हुए केंद्र सरकार ने कपास के आयात पर मिलने वाली कस्टम ड्यूटी (सीमा शुल्क) की छूट को दो महीने और बढ़ा दिया है। अब देश की कपड़ा मिलें और अन्य औद्योगिक कंपनियां आगामी 31 दिसंबर 2026 तक बिना किसी सीमा शुल्क के विदेशों से कपास का आयात कर सकेंगी। वित्त मंत्रालय द्वारा 30 अक्टूबर को जारी अधिसूचना संख्या 35/2026-कस्टम्स के तहत यह विस्तार किया गया है, जो पहले 31 अक्टूबर तक ही वैध था।

उत्पादन घटने की आशंका और सूखा वजह

सरकार द्वारा यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब देश में कपास के कुल उत्पादन को लेकर चिंताएं गहरी हो गई हैं। चालू 2026-27 सीजन के दौरान खेती के रकबे में कमी आने और महाराष्ट्र व कर्नाटक जैसे बड़े उत्पादक राज्यों के कुछ हिस्सों में सूखे का असर पड़ने से फसल की पैदावार प्रभावित होने की पूरी आशंका है। इसके अलावा, किसान बेहतर मुनाफे की उम्मीद में अपनी उपज को रोककर रख रहे हैं, जिससे मंडियों में आवक काफी सुस्त बनी हुई है।

मंडियों में कम आवक और ऊंचे दाम

बाजार के आंकड़ों के अनुसार, वर्तमान में कच्चे कपास की दैनिक आवक 70 हजार से 80 हजार गांठों (एक गांठ = 170 किलो) के आसपास सिमटी हुई है, जो बाजार की जरूरत से काफी कम है। 23 अक्टूबर तक देश में कुल आवक का आंकड़ा लगभग 15 लाख गांठों तक पहुंचा था, जबकि इस पूरे सीजन में खपत करीब 23 लाख गांठ रहने का अनुमान है। हालांकि, दिवाली के बाद मंडियों में कपास की आवक में तेजी आने की उम्मीद जताई जा रही है।

मिलों की घटेगी लागत और बढ़ेगी प्रतिस्पर्धा

कस्टम ड्यूटी में छूट मिलने से घरेलू कपड़ा मिलों को विदेशी बाजारों से आसानी से और कम लागत पर कच्चा माल जुटाने का विकल्प मिल गया है। इस फैसले से विशेष रूप से सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSME) को अपने उत्पादन की लागत नियंत्रित रखने में मदद मिलेगी। रियायती दरों पर आयात होने से भारतीय गारमेंट उद्योग अंतरराष्ट्रीय बाजार में अन्य देशों के मुकाबले अधिक मजबूत और प्रतिस्पर्धी स्थिति में बना रहेगा।

घरेलू किसानों और बाजार पर असर

आयात शुल्क में छूट बढ़ाने से हालांकि मिल मालिकों और औद्योगिक इकाइयों को लाभ पहुंचेगा, लेकिन इसका एक दूसरा पहलू घरेलू बाजार से भी जुड़ा है। जानकारों का मानना है कि विदेशों से कपास की खेप बढ़ने पर स्थानीय स्तर पर उत्पादित होने वाली कपास की कीमतों पर दबाव बन सकता है, जिससे किसानों को उनकी उपज के मनमुताबिक दाम मिलने में चुनौती आ सकती है।

 

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