दिल्ली-NCR में तेज बारिश होते ही गुरुग्राम(Gurugram) की सड़कों पर पानी भरना आम बात हो गई है। कई जगह सड़कें तालाब जैसी दिखने लगती हैं और अंडरपास में पानी भर जाता है। इसके मुकाबले नोएडा में हालात अक्सर कुछ बेहतर नजर आते हैं। इसकी वजह सिर्फ बारिश की मात्रा नहीं, बल्कि दोनों शहरों की प्लानिंग और जल-निकासी व्यवस्था में बड़ा अंतर है।
नोएडा में पहले बना ड्रेनेज नेटवर्क
नोएडा को विकसित करते समय सड़क, सीवर और बड़े ड्रेनेज सिस्टम जैसी बुनियादी सुविधाओं को पहले तैयार किया गया। इसके बाद बड़े पैमाने पर रिहायशी और व्यावसायिक निर्माण हुआ। शहर को यमुना और हिंडन नदियों की वजह से प्राकृतिक जल-निकासी का भी फायदा मिलता है।
गुरुग्राम में इसके उलट कई निजी कॉलोनियां और ऊंची इमारतें बुनियादी ढांचे से पहले विकसित हो गईं। यहां बारिश के पानी को बाहर निकालने के लिए सीधी नदी नहीं है। पानी मुख्य रूप से नालों के जरिए नजफगढ़ ड्रेन की ओर जाता है। समस्या यह है कि कई पुराने नाले अतिक्रमण और निर्माण के कारण प्रभावित हुए हैं।
कंक्रीट ने रोक दी प्राकृतिक निकासी
गुरुग्राम में कभी तालाब, जोहड़ और प्राकृतिक जल-मार्ग बारिश का पानी संभालते थे। तेजी से हुए निर्माण के कारण इनमें से कई खत्म हो गए या कंक्रीट के नीचे दब गए। जमीन की पानी सोखने की क्षमता भी कम हुई, जिससे बारिश का पानी तेजी से सड़कों और ड्रेनों पर दबाव डालता है।
गुरुग्राम की एक बड़ी समस्या अलग-अलग एजेंसियों के बीच बंटी जिम्मेदारी भी है। बड़े नालों से लेकर स्थानीय ड्रेनेज और हाईवे तक अलग-अलग विभागों के अधीन हैं। ऐसे में पूरे शहर की जल-निकासी के लिए एकीकृत जिम्मेदारी तय करना मुश्किल हो जाता है। यही वजह है कि गुरुग्राम में समस्या सिर्फ बारिश नहीं, बल्कि प्लानिंग, अतिक्रमण, प्राकृतिक जल-मार्गों के खत्म होने और बंटी हुई जिम्मेदारियों का नतीजा भी है।