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मिडिल ईस्ट में बढ़ते सैन्य तनाव का असर अब वैश्विक ऊर्जा बाजार पर साफ दिखाई देने लगा है। कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल दर्ज किया गया है और ब्रेंट क्रूड 115 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर गया है, जो जून 2022 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर माना जा रहा है। पिछले कुछ दिनों में क्रूड की कीमतों में करीब 18 प्रतिशत की तेजी आई है, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अस्थिरता बढ़ गई है।
सप्लाई को लेकर बढ़ी चिंता
तेल बाजार में तेजी की सबसे बड़ी वजह मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध और संभावित सप्लाई संकट है। कतर के ऊर्जा मंत्री ने चेतावनी दी है कि अगर संघर्ष जल्द समाप्त नहीं हुआ तो कच्चे तेल की कीमतें 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि खाड़ी देश तेल निर्यात पर सख्त कदम उठा सकते हैं, जिससे वैश्विक सप्लाई और प्रभावित हो सकती है।
हॉर्मुज जलडमरूमध्य पर असर
सप्लाई को लेकर सबसे बड़ी चिंता स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से जुड़ी है, जहां से दुनिया के बड़े हिस्से में तेल की आपूर्ति होती है। रिपोर्ट्स के अनुसार पिछले कई दिनों से यहां से रोजाना करीब 14 लाख बैरल तेल की सप्लाई प्रभावित होने की आशंका है। इसके अलावा इराक ने तेल उत्पादन में लगभग 70 प्रतिशत की कटौती कर दी है और कुवैत ने भी एहतियातन उत्पादन कम कर दिया है। इसी बीच प्राकृतिक गैस की कीमतों में भी तेजी देखी जा रही है।
किन सेक्टर पर पड़ेगा असर
कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का सबसे ज्यादा असर उन उद्योगों पर पड़ता है जिनकी लागत सीधे तौर पर ऊर्जा या पेट्रोलियम उत्पादों से जुड़ी होती है। इसमें ऑयल मार्केटिंग कंपनियां, एविएशन, पेंट, टायर, सीमेंट, लुब्रिकेंट और स्पेशियलिटी केमिकल सेक्टर शामिल हैं। तेल महंगा होने से इन कंपनियों की उत्पादन लागत बढ़ सकती है और मार्जिन पर दबाव आ सकता है।
कुछ कंपनियों को मिल सकता है फायदा
जहां कई उद्योगों पर दबाव बढ़ सकता है, वहीं तेल उत्पादन से जुड़ी कंपनियों को इसका लाभ मिल सकता है। ONGC और ऑयल इंडिया जैसी कंपनियों की कमाई पर कच्चे तेल की कीमत बढ़ने का सकारात्मक असर पड़ सकता है। अनुमान के अनुसार तेल की कीमत में हर 5 डॉलर की वृद्धि से इन कंपनियों की आय में 7 से 12 प्रतिशत तक बढ़ोतरी संभव है।
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