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अक्षरधाम मंदिर में हुई आज 108 फीट ऊंची नीलकंठ वर्णी मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा, ये है ​दुनिया की सबसे ऊंची ‘एक पांव पर खड़ी’ मूर्ति

Akshardham Temple: दिल्ली के स्वामीनारायण अक्षरधाम मंदिर में 26 मार्च का दिन एक ऐतिहासिक और आध्यात्मिक उत्सव के रूप में दर्ज हो गया। यहां ‘विश्व शांति महायज्ञ’ के साथ शुरू हुए भव्य आयोजन में हजारों श्रद्धालुओं ने हिस्सा लिया। इसी क्रम में 108 फीट ऊंची तपोमूर्ति श्री नीलकंठ वर्णी की प्राण प्रतिष्ठा का आयोजन किया जा रहा है, जिसने इस पूरे समारोह को और विशेष बना दिया है। सुबह की हल्की धूप, मंदिर की घंटियों की गूंज और श्रद्धालुओं की भीड़ ने पूरे परिसर को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया। देश ही नहीं, बल्कि विदेशों से भी लोग इस आयोजन में शामिल होने पहुंचे, जिससे यह आयोजन वैश्विक स्तर पर चर्चा का केंद्र बन गया।

महंत स्वामी महाराज की मौजूदगी ने बढ़ाया महत्व

इस आयोजन में बीएपीएस संस्था के आध्यात्मिक प्रमुख महंत स्वामी महाराज की उपस्थिति खास आकर्षण रही। उनके 19 मार्च को दिल्ली आगमन के बाद से ही कार्यक्रमों की श्रृंखला शुरू हो गई थी, जिसमें विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान और सभाएं आयोजित की गईं। उनके मार्गदर्शन में ही महायज्ञ संपन्न हुआ।

विश्व शांति महायज्ञ से हुआ आगाज

25 मार्च को आयोजित ‘विश्व शांति महायज्ञ’ इस भव्य कार्यक्रम की शुरुआत थी। वैदिक परंपरा के अनुसार हुए इस यज्ञ में 300 से अधिक संतों ने भाग लिया, जिनमें ब्रिटेन, फ्रांस, अमेरिका, अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया से आए संत भी शामिल थे। इस दौरान महंत स्वामी महाराज ने विश्व शांति, एकता और भाईचारे के लिए प्रार्थना की और सफेद कबूतर उड़ाकर शांति का संदेश दिया।

नीलकंठ वर्णी- त्याग और साधना का प्रतीक

नीलकंठ वर्णी, भगवान स्वामीनारायण के बाल स्वरूप माने जाते हैं, जिन्होंने मात्र 11 वर्ष की आयु में गृह त्याग कर आध्यात्मिक यात्रा शुरू की। सात वर्षों में उन्होंने करीब 12,000 किलोमीटर की यात्रा कर देश के विभिन्न तीर्थों का भ्रमण किया। उनका जीवन त्याग, अनुशासन और सेवा का प्रतीक माना जाता है।

108 फीट की अनोखी प्रतिमा बनी आकर्षण का केंद्र

इस आयोजन का मुख्य आकर्षण 108 फीट ऊंची पंचधातु से बनी नीलकंठ वर्णी की प्रतिमा है, जो एक पैर पर खड़े तपस्वी रूप में दर्शाई गई है। इसे दुनिया की अपनी तरह की पहली प्रतिमा माना जा रहा है। करीब एक साल में तैयार हुई इस मूर्ति को बनाने में साधुओं, 50 से अधिक कारीगरों और कई स्वयंसेवकों ने योगदान दिया है। 8 फीट ऊंचे चबूतरे पर स्थापित यह प्रतिमा श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र बन गई है।

श्रद्धालुओं की भारी भागीदारी

महायज्ञ के दौरान सैकड़ों संतों ने वैदिक विधि-विधान से अनुष्ठान किया। वहीं, बड़ी संख्या में श्रद्धालु भी इसमें शामिल हुए। कई लोग अपने परिवार के साथ पहुंचे, तो कई युवा पहली बार इस तरह के आध्यात्मिक आयोजन का हिस्सा बने। मंदिर परिसर में शांत और सकारात्मक वातावरण देखने को मिला, जहां लोग ध्यान और भक्ति में लीन नजर आए। कुल मिलाकर, अक्षरधाम में आयोजित यह ‘विश्व शांति महायज्ञ’ केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक एकता, आध्यात्मिक जागरूकता और वैश्विक शांति का संदेश देने वाला एक ऐतिहासिक अवसर बनकर उभरा।

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