सुप्रीम कोर्ट ममता बनर्जी की SIR के खिलाफ दायर याचिका पर आज सुनवाई करेगा
पश्चिम बंगाल में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले वोटर लिस्ट को लेकर छिड़ा विवाद अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुका है। आज देश की सर्वोच्च अदालत में इस मामले की अहम सुनवाई होने जा रही है। मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस (TMC) के सांसदों की याचिकाओं पर विचार करेगी
पश्चिम बंगाल में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले वोटर लिस्ट को लेकर छिड़ा विवाद अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुका है। आज देश की सर्वोच्च अदालत में इस मामले की अहम सुनवाई होने जा रही है। मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस (TMC) के सांसदों की याचिकाओं पर विचार करेगी। इस सुनवाई की सबसे बड़ी चर्चा यह है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद सुप्रीम कोर्ट में अपनी दलीलें पेश कर सकती हैं। चूंकि ममता बनर्जी ने कानून की पढ़ाई की है, ऐसे में TMC सूत्रों का कहना है कि वे इस संवेदनशील मुद्दे की गंभीरता को सीधे अदालत के सामने रखना चाहती हैं।
सुप्रीम कोर्ट की हाई-प्रोफाइल बेंच करेगी सुनवाई
इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की एक वरिष्ठ पीठ करेगी, जिसमें मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत के साथ न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली शामिल हैं।
मुख्यमंत्री के अलावा TMC सांसद डेरेक ओ’ब्रायन, डोला सेन और मोस्तारी बानो ने भी वोटर लिस्ट की ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (SIR) प्रक्रिया के खिलाफ याचिकाएं दायर की हैं।
क्या है SIR विवाद और 1.25 करोड़ नामों का पेंच?
इस पूरे विवाद की जड़ है वोटर लिस्ट का ‘Special Intensive Revision’ यानी SIR। आरोप है कि इस प्रक्रिया के तहत बंगाल में करीब 1.25 करोड़ मतदाताओं के नाम ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ सूची में डाल दिए गए हैं। यह विसंगतियां मुख्य रूप से वर्ष 2002 की मतदाता सूची से मौजूदा आंकड़ों की तुलना के दौरान सामने आई हैं।
बताई गई प्रमुख विसंगतियां इस प्रकार हैं:
मतदाता और माता-पिता की उम्र में 15 साल से कम का अंतर
माता-पिता और बच्चे की उम्र में 50 साल से अधिक का अंतर
नामों की स्पेलिंग या पहचान से जुड़ी तकनीकी गड़बड़ियां
TMC का आरोप है कि इन तकनीकी आधारों पर लाखों वास्तविक मतदाताओं के नाम काटे जा सकते हैं, जो लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा है।
ममता बनर्जी और TMC के गंभीर आरोप
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने 28 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी, जिसमें निर्वाचन आयोग और पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को पक्षकार बनाया गया है।
इससे पहले उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त को पत्र लिखकर SIR प्रक्रिया को “मनमाना और खामियों से भरा” बताया था।ममता बनर्जी का तर्क है कि यदि मौजूदा स्वरूप में यह प्रक्रिया जारी रही, तो बड़ी संख्या में लोग अपने मताधिकार से वंचित हो सकते हैं, जो सीधे-सीधे संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है। वहीं, TMC सांसद डेरेक ओ’ब्रायन ने आरोप लगाया है कि चुनाव आयोग लिखित आदेशों की बजाय अनौपचारिक निर्देशों के जरिए काम कर रहा है, जो पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल खड़े करता है। पार्टी की मांग है कि सभी दावे और आपत्तियों का निपटारा होने तक अंतिम वोटर लिस्ट जारी न की जाए।
पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख
इससे पहले 19 जनवरी को हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को कई अहम निर्देश दिए थे। अदालत ने कहा था कि SIR की पूरी प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए ताकि आम मतदाताओं को किसी तरह की परेशानी न हो। कोर्ट ने यह भी आदेश दिया था कि जिन मतदाताओं के नाम ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ सूची में हैं, उनकी सूची ग्राम पंचायत भवनों और ब्लॉक कार्यालयों में सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित की जाए, ताकि लोग समय रहते आपत्तियां दर्ज करा सकें।
आज की सुनवाई क्यों है अहम?
आज की सुनवाई बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। यदि ममता बनर्जी खुद सुप्रीम कोर्ट में दलीलें रखती हैं, तो यह भारतीय राजनीति और न्यायिक इतिहास में एक दुर्लभ घटना होगी।
2026 के बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले यह मामला न सिर्फ कानूनी बल्कि राजनीतिक रूप से भी बेहद संवेदनशील बन चुका है। अब सबकी नजर सुप्रीम कोर्ट के रुख पर टिकी है, क्या अदालत SIR प्रक्रिया पर और सख्त निर्देश देगी या चुनाव आयोग को राहत मिलेगी, इसका फैसला आज की सुनवाई में साफ हो सकता है।
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