बैसाखी और खालसा साजना दिवस के अवसर पर पाकिस्तान स्थित ऐतिहासिक गुरुद्वारों के दर्शन के लिए गया 1763 सिख श्रद्धालुओं का जत्था(Sikh Devotees) आज भारत लौट रहा है। यह दल अटारी-वाघा सीमा के जरिए दोपहर बाद देश में प्रवेश करेगा। जत्थे का नेतृत्व शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) ने किया था, जिसमें पंजाब समेत कई इलाकों से श्रद्धालु शामिल हुए थे।
श्रद्धालुओं ने प्रमुख गुरुद्वारों के किए दर्शन
इस धार्मिक यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं ने पाकिस्तान में मौजूद प्रमुख गुरुद्वारों के दर्शन किए, जिनका सिख इतिहास से गहरा संबंध माना जाता है। यात्रा ने जहां एक ओर श्रद्धालुओं की आस्था को और मजबूत किया, वहीं उन्हें अपने पवित्र इतिहास और विरासत से जुड़ने का अवसर भी मिला। कई श्रद्धालुओं ने भावुक होकर बताया कि उन्होंने बचपन से जिन गुरुद्वारों के बारे में सुना था, वहां जाकर दर्शन करने का अनुभव बेहद खास रहा।
जानकारी के अनुसार, यह जत्था 10 अप्रैल को भारत से रवाना हुआ था और निर्धारित कार्यक्रम के तहत आज यानी 19 अप्रैल को वापसी कर रहा है। पहले इसकी वापसी की तारीख 21 अप्रैल तय थी, लेकिन बाद में यात्रा कार्यक्रम में बदलाव किया गया।
हर साल दर्शन करने जाते हैं भारतीय श्रद्धालु
हर साल बैसाखी और खालसा साजना दिवस के अवसर पर बड़ी संख्या में भारतीय सिख श्रद्धालु पाकिस्तान में पवित्र गुरुद्वारों के दर्शन के लिए जाते हैं। यह धार्मिक यात्रा भारत और पाकिस्तान के बीच तय किए गए नेहरू-लियाकत समझौते के तहत संभव होती है, जो सीमापार तीर्थयात्रा की सुविधा प्रदान करता है। इस व्यवस्था की नींव 1950 के इस नेहरू-लियाकत समझौता से रखी गई थी जिसे इसे दिल्ली समझौता के नाम से भी जाना जाता है।
यह भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली खान के बीच 8 अप्रैल 1950 को नई दिल्ली में हुआ था, इस समझौते पर हस्ताक्षर कर उन्होंने सीमा पार रह रहे लोगों को उनके धार्मिक और भावनात्मक अधिकारों कर सुरक्षित कर दिया था। इस समझौते का मुख्य उद्देश्य दोनों देशों में अल्पसंख्यकों के अधिकारों, सुरक्षा और सम्मान को सुनिश्चित करना था।
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