Strait of Hormuz Impact: पश्चिम एशिया में जारी युद्ध और होर्मुज स्ट्रेट में बाधित आवाजाही के बीच भारत ने अपनी ऊर्जा रणनीति में बड़ा बदलाव किया है। खाड़ी देशों से तेल और गैस की आपूर्ति प्रभावित होने के बाद भारत ने तेजी से रूस की ओर रुख किया है, जिससे देश की ऊर्जा जरूरतों को फिलहाल स्थिर बनाए रखने में मदद मिली है। रिपोर्ट्स के अनुसार, मार्च के पहले 25 दिनों में रूस से भारत का कच्चे तेल का आयात 82.3 प्रतिशत बढ़कर 1.9 मिलियन बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गया है। वहीं, कुल आयात में रूस की हिस्सेदारी फरवरी के 20.1 प्रतिशत से बढ़कर मार्च में 45.2 प्रतिशत हो गई है। अनुमान है कि पूरे महीने में यह आंकड़ा 2 मिलियन बैरल प्रतिदिन के करीब पहुंच सकता है, जो लगभग रिकॉर्ड स्तर है।
होर्मुज संकट से प्रभावित हुई सप्लाई
पश्चिम एशिया में ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव और इसमें अमेरिका की भागीदारी के कारण क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ी है। इसके चलते होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही लगभग ठप हो गई है। यह मार्ग वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, जहां से दुनिया के करीब 20 प्रतिशत तेल और एलएनजी गुजरता है। भारत के लिए यह मार्ग और भी अहम है, क्योंकि हाल के महीनों में देश के लगभग आधे कच्चे तेल का आयात इसी रास्ते से होता रहा है। ऐसे में इस मार्ग के प्रभावित होने से भारत की ऊर्जा आपूर्ति पर सीधा असर पड़ा।
खाड़ी देशों से आयात में भारी गिरावट
मार्च महीने में खाड़ी देशों से भारत के तेल आयात में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। इराक और दुबई से आयात 69.2 प्रतिशत और 72.8 प्रतिशत घट गया। वहीं सऊदी अरब और कुवैत से आपूर्ति में भी 45 प्रतिशत से अधिक की कमी आई है। यह गिरावट सीधे तौर पर फरवरी के अंत में शुरू हुए युद्ध और क्षेत्रीय तनाव का परिणाम मानी जा रही है, जिसने आपूर्ति श्रृंखला को बुरी तरह प्रभावित किया है।
भारत ने तेजी से बदली रणनीति
खाड़ी देशों से आपूर्ति में आई इस कमी को संतुलित करने के लिए भारत ने तेजी से रूस से तेल खरीद बढ़ाई। विशेषज्ञों के अनुसार, यह कदम केवल तात्कालिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि एक रणनीतिक फैसला है। जैसे ही खाड़ी आपूर्ति बाधित हुई, भारतीय रिफाइनरियों ने वैकल्पिक स्रोत के रूप में रूसी तेल की खरीद बढ़ा दी, जिससे रिफाइनिंग संचालन प्रभावित नहीं हुआ।
ऊर्जा सुरक्षा पर फिलहाल असर सीमित
भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का 88 प्रतिशत से अधिक आयात करता है। ऐसे में वैश्विक संकट का असर सीधे अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। हालांकि मौजूदा स्थिति में प्रभाव सीमित नजर आ रहा है। विशेषज्ञों के मुताबिक, कुल आयात में लगभग 8 लाख बैरल प्रतिदिन की कमी आई है, लेकिन रिफाइनरियों ने अपने वाणिज्यिक भंडार (इन्वेंटरी) का उपयोग कर इस कमी को पूरा किया है। साथ ही पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात भी सामान्य स्तर पर बना हुआ है, जो देश की रिफाइनिंग क्षमता को दर्शाता है।
अमेरिका के रुख में आया बदलाव
इस पूरे घटनाक्रम में अमेरिका का बदला हुआ रुख भी अहम है। पहले जहां अमेरिका भारत पर रूसी तेल आयात कम करने का दबाव बना रहा था, वहीं अब उसने अस्थायी छूट देकर इस खरीद को मंजूरी दे दी है। विश्लेषकों के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों को नियंत्रित रखना और घरेलू राजनीतिक कारण इस फैसले के पीछे मुख्य वजह हैं। इससे वैश्विक बाजार में आपूर्ति संतुलन बनाए रखने की कोशिश भी की जा रही है।
रूस बना सबसे अहम विकल्प
दिलचस्प बात यह है कि कुछ समय पहले तक जो रूसी तेल खरीदारों के अभाव में पड़ा हुआ था, वही अब भारत के लिए सबसे अहम विकल्प बन गया है। बढ़ती मांग के कारण अब यह तेल पहले की तरह छूट पर नहीं, बल्कि प्रीमियम पर बिक रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में स्थिति काफी हद तक होर्मुज जलडमरूमध्य में सामान्य हालात बहाल होने पर निर्भर करेगी। अगर यह मार्ग जल्द नहीं खुलता, तो भारत को अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए रूस पर निर्भरता और बढ़ानी पड़ सकती है।
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