Wednesday, February 11, 2026
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ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता विनोद शुक्ला का निधन, PM मोदी ने जताया दुख

भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित प्रख्यात साहित्यकार विनोद कुमार शुक्ल का मंगलवार शाम निधन हो गया। वे 89 वर्ष के थे। उनके पुत्र शाश्वत शुक्ल ने बताया कि सांस लेने में तकलीफ के चलते उन्हें इस महीने की 2 तारीख को रायपुर स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में भर्ती कराया गया था, जहां शाम 4.48 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके परिवार में पत्नी, पुत्र शाश्वत और एक बेटी हैं।

पीएम मोदी ने जताया शोक

विनोद कुमार शुक्ल के निधन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गहरा दुख व्यक्त किया है। उन्होंने एक्स पर लिखा कि ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित प्रख्यात लेखक विनोद कुमार शुक्ल जी के निधन से अत्यंत दुख हुआ है। हिंदी साहित्य में उनके अमूल्य योगदान को हमेशा याद रखा जाएगा। शोक की इस घड़ी में मेरी संवेदनाएं उनके परिजनों और प्रशंसकों के साथ हैं। ओम शांति।
गौरतलब है कि प्रधानमंत्री मोदी ने पिछले महीने 1 नवंबर को शुक्ल से फोन पर बात कर उनके स्वास्थ्य के बारे में जानकारी ली थी।

अक्टूबर से चल रहे थे बीमार

शाश्वत शुक्ल के अनुसार, अक्टूबर में भी सांस संबंधी परेशानी के कारण उन्हें रायपुर के एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। तबीयत में सुधार के बाद उन्हें छुट्टी दे दी गई थी और वे घर पर इलाज करा रहे थे। लेकिन 2 दिसंबर को अचानक स्वास्थ्य अधिक बिगड़ने पर उन्हें रायपुर एम्स में भर्ती कराया गया।

21 नवंबर को मिला था ज्ञानपीठ पुरस्कार

विनोद कुमार शुक्ल को उनके उल्लेखनीय साहित्यिक योगदान के लिए 59वां ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया था। 21 नवंबर को रायपुर स्थित उनके निवास पर आयोजित एक समारोह में यह सम्मान उन्हें दिया गया।

धीमी आवाज, लेकिन गहरी साहित्यिक छाप

1 जनवरी 1937 को छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव में जन्मे विनोद कुमार शुक्ल हिंदी साहित्य के ऐसे रचनाकार थे, जो बेहद धीमे बोलते थे, लेकिन उनकी रचनाओं की आवाज साहित्य की दुनिया में बहुत दूर तक गूंजती थी। उन्होंने मध्यमवर्गीय, साधारण और अक्सर अनदेखे जीवन को अपनी संवेदनशील भाषा में अभिव्यक्त किया और हिंदी साहित्य को एक नई दृष्टि दी।

कविता से उपन्यास तक रचनात्मक सफर

उनका पहला कविता संग्रह ‘लगभग जय हिन्द’ 1971 में प्रकाशित हुआ, जिसने हिंदी कविता में उनकी विशिष्ट भाषा और कोमल संवेदनशीलता को पहचान दिलाई। 1979 में आया उनका उपन्यास ‘नौकर की कमीज़’ हिंदी कथा साहित्य में मील का पत्थर माना जाता है, जिस पर प्रसिद्ध फिल्मकार मणि कौल ने फिल्म भी बनाई। इसके अलावा ‘खिलेगा तो देखेंगे’, ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ और ‘एक चुप्पी जगह’ जैसी कृतियां भी उनकी साहित्यिक पहचान का अहम हिस्सा हैं।

अनेक सम्मानों से हो चुके थे सम्मानित

विनोद कुमार शुक्ल को उनके जीवनकाल में साहित्य अकादमी पुरस्कार, गजानन माधव मुक्तिबोध फेलोशिप, रजा पुरस्कार, शिखर सम्मान, राष्ट्रीय मैथिलीशरण गुप्त सम्मान, दयावती मोदी कवि शेखर सम्मान, हिंदी गौरव सम्मान और 2023 में पैन-नाबोकोव पुरस्कार सहित कई प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया था। उनके निधन से हिंदी साहित्य जगत ने एक संवेदनशील और अनोखी आवाज खो दी है।

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