Bangladesh की भारत के साथ 960 करोड़ की डील हुई कैंसल

बांग्लादेश की सत्ता में आए मोहम्मद यूनुस अब सिर्फ अंतरिम प्रधानमंत्री नहीं, बल्कि भारत के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर उभरे हैं।

Jan 27, 2026 - 19:31
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Bangladesh की भारत के साथ 960 करोड़ की डील हुई कैंसल

बांग्लादेश की सत्ता में आए मोहम्मद यूनुस अब सिर्फ अंतरिम प्रधानमंत्री नहीं, बल्कि भारत के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर उभरे हैं। सत्ता संभालने के बाद से जहां देश में कट्टरपंथी तत्वों को खुली छूट मिलने के आरोप लग रहे हैं। इसी बीच भारत और बांग्लादेश के बीच 960 करोड़ का प्रोजेक्ट रद्द कर दिया है।

960 करोड़ का भारतीय प्रोजेक्ट रद्द

मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने भारत के लिए बेहद अहम माने जा रहे इंडियन इकोनॉमिक जोन को पूरी तरह रद्द करने का फैसला लिया है। यह प्रोजेक्ट बांग्लादेश के चटगांव जिले के मीरसराय इलाके में प्रस्तावित था, जहां भारतीय कंपनियों को फैक्ट्रियां लगाने के लिए जमीन दी जानी थी। इस प्रोजेक्ट के लिए भारत पहले ही करीब 960 करोड़ रुपये को मंजूरी दे चुका था।

BEZA की बैठक में भारत को किया गया किनारे

ढाका के तेजगांव में बांग्लादेश आर्थिक क्षेत्र प्राधिकरण (BEZA) की गवर्निंग बोर्ड बैठक में इस प्रोजेक्ट को औपचारिक रूप से रद्द कर दिया गया। BEZA के कार्यकारी अध्यक्ष चौधरी आशिक महमूद बिन हारून ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में साफ कहा कि मीरसराय में अब इंडियन इकोनॉमिक जोन नहीं बनेगा। उनके मुताबिक, अब उसी जमीन पर एक ‘डिफेंस इंडस्ट्रियल पार्क’ विकसित किया जाएगा, जहां आर्थिक गतिविधियों की जगह हथियार, गोला-बारूद और टैंक के पुर्जे बनाए जाएंगे।

चौधरी आशिक महमूद कही ये बात

प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिए गए तर्क ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। चौधरी आशिक महमूद ने वैश्विक युद्धों का हवाला देते हुए कहा कि आज के दौर में जंग जीतने के लिए सिर्फ आधुनिक फाइटर जेट्स नहीं, बल्कि गोला-बारूद और टैंक जैसे बुनियादी हथियारों की उपलब्धता ज्यादा अहम है। यानी बांग्लादेश सरकार का फोकस अब विदेशी निवेश और रोजगार से हटकर घरेलू हथियार निर्माण पर चला गया है।

क्या था इंडियन इकोनॉमिक जोन?

मीरसराय परियोजना को दक्षिण एशिया के सबसे बड़े औद्योगिक हब के रूप में विकसित करने की योजना थी। करीब 1,000 एकड़ जमीन इस प्रोजेक्ट के लिए चिन्हित की गई थी। इस जोन में टाटा, अडानी जैसी भारत की दिग्गज कंपनियों के निवेश की योजना थी, जिससे बांग्लादेश में बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा होते, भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को नए व्यापारिक रास्ते मिलते और दोनों देशों के बीच आर्थिक साझेदारी और मजबूत होती।

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