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ग्रामीण पंचायतों में OBC आरक्षण के लिए बनेगा विशेष आयोग, योगी कैबिनेट में लिया गया अहम निर्णय

उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों को लेकर एक बड़ा नीतिगत बदलाव सामने आया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ(Yogi Cabinet) की अध्यक्षता में सोमवार (18 मई) को हुई राज्य मंत्रिमंडल की बैठक में कई अहम प्रस्तावों पर मुहर लगी। इनमें सबसे महत्वपूर्ण निर्णय अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के आरक्षण से जुड़ा रहा जिसे पंचायत व्यवस्था में अधिक पारदर्शी और आंकड़ा-आधारित बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

कैबिनेट ने ग्रामीण स्थानीय निकायों अर्थात ग्राम पंचायत, क्षेत्र पंचायत और जिला पंचायत में पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण की स्थिति का वैज्ञानिक तरीके से आकलन करने के लिए एक विशेष आयोग के गठन को मंजूरी दी है। इस आयोग का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि OBC वर्ग को उनकी वास्तविक सामाजिक-आर्थिक स्थिति और जनसंख्या के अनुपात के आधार पर प्रतिनिधित्व मिल सके।

आयोग में कुल पांच सदस्य होंगे शामिल

सरकार द्वारा गठित किए जा रहे इस “समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग” में कुल पांच सदस्य शामिल होंगे। इन सदस्यों की नियुक्ति ऐसे व्यक्तियों में से की जाएगी जिन्हें पिछड़े वर्गों से जुड़े विषयों का गहन अनुभव और ज्ञान हो। आयोग की अध्यक्षता एक सेवानिवृत्त उच्च न्यायालय न्यायाधीश करेंगे जिससे इसकी निष्पक्षता और विश्वसनीयता को मजबूत आधार मिल सके।

आयोग का कार्यकाल सामान्यतः छह महीने का होगा। इस अवधि में यह पूरे राज्य के 75 जिलों में जाकर विस्तृत अध्ययन करेगा। इसमें जातिवार जनसंख्या के आंकड़ों की समीक्षा, सामाजिक-आर्थिक स्थिति का विश्लेषण और वर्तमान आरक्षण व्यवस्था के प्रभावों का मूल्यांकन शामिल होगा। इसके बाद आयोग अपनी रिपोर्ट तैयार करेगा जिसके आधार पर पंचायत चुनावों में OBC आरक्षण की नई रूपरेखा तय की जाएगी।

OBC के लिए आरक्षण की सीमा निर्धारित

वर्तमान में उत्तर प्रदेश में पंचायत आरक्षण की व्यवस्था संविधान के प्रावधानों के अनुसार लागू होती है, जिसके तहत अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़े वर्गों को प्रतिनिधित्व दिया जाता है। OBC के लिए अधिकतम 27 प्रतिशत आरक्षण की सीमा निर्धारित है। हालांकि, हाल के न्यायिक निर्देशों के बाद सरकार अब चाहती है कि यह व्यवस्था अधिक वैज्ञानिक और वास्तविक आंकड़ों पर आधारित हो ताकि किसी भी वर्ग के साथ असंतुलन न हो।

आयोग की रिपोर्ट तैयार होने के बाद इसे सरकार के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा। इसके बाद राजनीतिक दलों और अन्य हितधारकों से सुझाव और आपत्तियां भी ली जाएंगी। इन आपत्तियों के निवारण में लगभग एक माह का समय लगने की संभावना है जिसके बाद अंतिम आरक्षण व्यवस्था लागू की जाएगी।

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