Thursday, February 19, 2026
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एयर इंडिया प्लेन का ब्लैक बॉक्स मिला, कैसे खोलता है ब्लैक बॉक्स प्लेन क्रैश के राज?

एयर इंडिया विमान दुर्घटना के बाद ब्लैक बॉक्स की पहली तस्वीर सामने आई है। इमरजेंसी लोकेटर ट्रांसमीटर (ELT) मिल गया है जिसे ब्लैक बॉक्स असेंबली का ही एक हिस्सा माना जाता है। यह डिवाइस दुर्घटना के दौरान या उसके बाद विमान का पता लगाने में मदद करने के लिए सैटेलाइट को संकट संकेत भेजता है।

ELT ब्लैक बॉक्स के बगल में होता है

लेकिन यह फ्लाइट डेटा रिकॉर्डर या कॉकपिट वॉयस रिकॉर्डर नहीं है। इमरजेंसी लोकेटर ट्रांसमीटर खास तौर पर जंगल या समुद्र के मामले में अहम भूमिका निभाता है। यह ब्लैक बॉक्स के बगल में होता है।

ऑरेंज रंग का ब्लैक बॉक्स

ब्लैक बॉक्स एक खास डिवाइस है। इसका रंग चमकीला नारंगी होता है ताकि दुर्घटना के बाद इसे आसानी से ढूंढा जा सके। इसे हवाई जहाज में लगाया जाता है। इसका काम उड़ान से जुड़ी हर जानकारी रिकॉर्ड करना होता है। कमर्शियल एयरक्राफ्ट में दो ऐसे रिकॉर्डर होते हैं। ये रिकॉर्डर एक मजबूत आवरण में बंद होते हैं। ये आवरण विस्फोट, आग, पानी के दबाव और तेज गति से होने वाली दुर्घटनाओं को झेल सकते हैं। यानी इन चीजों का ब्लैक बॉक्स पर कोई असर नहीं होता और इसमें रिकॉर्ड किया गया डेटा सुरक्षित रहता है।

क्या होता है इसका काम?

ब्लैक बॉक्स के दो हिस्से होते हैं। पहला फ्लाइट डेटा रिकॉर्डर (FDR) और दूसरा कॉकपिट वॉयस रिकॉर्डर (CVR) होता है। इन दोनों हिस्सों को मिलाकर ब्लैक बॉक्स कहा जाता है। फ्लाइट डेटा रिकॉर्डर इंजन के प्रदर्शन, कंट्रोल सरफेस मूवमेंट और सिस्टम अलर्ट के बारे में जानकारी देता है। यह ऊंचाई, गति, इंजन थ्रस्ट और फ्लाइट पाथ डेटा जैसे महत्वपूर्ण तकनीकी मापदंडों के बारे में भी जानकारी देता है।

कॉकपिट वॉयस रिकॉर्डर दिखाता है कि चालक दल ने आपातकालीन चेकलिस्ट का पालन किया या नहीं, उन्होंने कैसे प्रतिक्रिया दी और क्या उन्होंने किसी तकनीकी समस्या पर चर्चा की। कॉकपिट वॉयस रिकॉर्डर कॉकपिट के सभी ऑडियो रिकॉर्ड करता है। इसमें पायलट की बातचीत, रेडियो प्रसारण, चेतावनी अलार्म और आसपास की यांत्रिक आवाज़ें शामिल हैं। ये आवाज़ें दुर्घटना से ठीक पहले के क्षणों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी दे सकती हैं।

रंग नारंगी तो नाम में ब्लैक शब्द क्यों?

अब सवाल यह उठता है कि जब इसका रंग नारंगी है तो इसके नाम में काला शब्द क्यों है, यानी इसे ब्लैक बॉक्स क्यों कहते हैं? दरअसल, इसे साल 1954 में हवाई जहाजों में लगाना शुरू किया गया था, उस समय इसकी भीतरी दीवार को काला रखा जाता था. वो फोटो फिल्म आधारित डेटा को सुरक्षित रखने के लिए था। इसे अंदर से काला रंग देने से ये एक अंधेरे कमरे की तरह काम करता था, इसी वजह से इसे ब्लैक बॉक्स कहा जाता है।

दरअसल, पहले फोटो खींचने के लिए कैमरे में रील का इस्तेमाल किया जाता था, तब आज की तरह डिजिटल फोटोग्राफी का जमाना नहीं था, इस रील को नेगेटिव भी कहा जाता था, फोटो खींचने के बाद इसी नेगेटिव से फोटो तैयार की जाती थी. इस फोटो को एक अंधेरे कमरे में तैयार करना होता था, ऐसा कमरा जहां सूरज की एक भी किरण न पहुंचती हो, थोड़ी सी धूप में ये नेगेटिव खराब हो जाता है। ब्लैक बॉक्स के शुरुआती मॉडल में इसी प्रक्रिया का इस्तेमाल किया गया था, इसी वजह से इसकी भीतरी दीवार को काला रखा गया और इसे आज भी ब्लैक बॉक्स ही कहा जाता है।

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