घाटी के युवाओं में भविष्य संवारने की ललक बढ़ी है। वे केंद्रीय लोक सेवा आयोग की परीक्षा (2009) में टॉप करने वाले कुपवाड़ा के शाह फैजल और 2015 में दूसरे स्थान पर रहने वाले अनंतनाग के गांव से अतहर आमिर शफी खान की तरह रियासत का नाम रोशन करना चाहते हैं। कर्फ्यू और पाबंदियों के बीच बुधवार 24 अगस्त से एमबीबीएस और बीडीएस की शुरू काउंसलिंग के लिए घाटी के उम्मीदवारों की सौ फीसदी हाजिरी ने यह साबित भी कर दिया है। बोर्ड आफ प्रोफेशनल एंट्रेंस एग्जामिनेशन (बीओपीईई) के चेयरमैन जीएच तांत्रे ने कहा कि काउंसलिंग के लिए सभी उम्मीदवार पहुंच रहे

भारत प्रशासित कश्मीर में जारी गतिरोध अगर जल्द ख़त्म न हुआ, वहां प्रदर्शन जारी रहे तो ये आंदोलन कट्टरपंथी ताकतों के हाथों में जा सकता है। भारत विरोधी और इस्लामिक कट्टरपंथी सैयद सलाहुद्दीन और मौलाना मसूद अज़हर का असर दक्षिण कश्मीर में पिछले कुछ सालों में काफी बढ़ा है। जानकारों को डर है कि यदि केंद्र सरकार और कश्मीर के आंदोलनकारियों के बीच गतिरोध जारी रहा तो युवाओं के बीच इन लोगों का असर बहुत ज़्यादा बढ़ सकता है। पिछले महीने 8 जुलाई को हिज़्बुल मुजाहिदीन के चरमपंथी बुरहान वानी के मुठभेड़ में मारे जाने के बाद वहां जारी हिंसा के कारण

केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह के दौरे के क्रम कश्मीर में शांति प्रयासों पर स्थानीय दलों की सियासी प्रतिस्पर्धा हावी दिखी। पीडीपी और नेशनल कांफ्रेंस में हालात बिगाड़ने के लिए परस्पर दोषी ठहराने की नीति और इस मुद्दे पर शुरू हुई जंग से शांति मिशन का लक्ष्य प्रभावित हो सकता है। वैसे राजनाथ ने सभी पक्षों से साफ कर दिया है कि शांति प्रयासों के नाम पर उपद्रवियों को कई छूट नहीं मिलेगी। मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती के साथ अलग से हुई बैठक में राजनाथ ने हालात से निपटने में रियासत सरकार के प्रयासों पर असंतोष भी जाहिर किया।

जम्मू-कश्मीर में शांति मिशन पर आए केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह के समक्ष उपद्रवियों का खौफ खत्म करने की चुनौती सबसे बड़ी है। बीएसएफ की तैनाती से उपद्रवियों को सख्त संदेश देने की कोशिश जरूर हुई है, लेकिन, श्रीनगर से लेकर घाटी के गांवों तक उपद्रवियों के खौफ का असर अब भी कायम है। आम लोग भय से प्रदर्शनों में शामिल होते हैं और पैसों का लालच बच्चों को पत्थरबाज बनाता है। आतंकी संगठन निचले स्तर के सरकारी मुलाजिमों पर इस्तीफे के लिए जवाब बनाने लगे हैं। मुख्यधारा के सियासी दलों के कुछ नेताओं में भी उपद्रवियों का खौफ है। हमले

केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह के कश्मीर दौरे में रियासत में राज्यपाल शासन लागू करने की संभावना पर भी मंथन चल रहा है। सूत्रों के मुताबिक बिगड़े हालात को पटरी पर लाने के लिए केंद्र इस विकल्प पर भी गंभीर है। हालांकि, रियासत में भाजपा भी सरकार में शामिल है और मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती खुलकर सुरक्षा बलों की कार्रवाइयों का समर्थन कर रही हैं। लेकिन, इसके बावजूद हालात में सुधार नहीं हुए तो केंद्र इस विकल्प को आजमा सकता है। राज्यपाल एनएन वोहरा पहले ही पद से छुट्टी की केंद्र से गुहार लगा चुके हैं। ऐसे में राज्यपाल शासन से पहले गवर्नर

आतंकी बुरहान की मौत के बाद से जारी हिंसा को लेकर गुरुवार को गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती से मुलाकात की। इस दौरान घाटी में शांति कायम करने के विभिन्य पहलुओं पर चर्चा हुई। पत्रकार वार्ता के दौरान जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने कहा कि कुछ मतलबी लोग बच्चों और युवाओं को सड़कों पर पत्थर मारने के लिए मजबूर करते हैं। कश्मीर में अशांति फैलाने वालों पर सख्ती से कार्रवाई की जाएगी। इसके साथ ही उन्होंने कश्मीर पर वाजपेयी की नीतियों की तारीफ की। महबूबा ने कहा कि सेना और सुरक्षा बलों के कैंपों पर हमला करने से

घाटी के हालात का जायजा लेने के लिए दो दिवसीय यात्रा पर कश्मीर दौरे पर गए गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने गुरुवार को कहा कि कश्मीर की बड़ी आबादी शांति के पक्ष में है। उन्होंने सभी कश्मीरियों से अपील की कि वे कश्मीरी युवाओं के भविष्य से न खेलें, उनको पत्थर उठाने के लिए न उकसाएं। गृह मंत्री ने कहा कि बच्चे तो बच्चे हैं, अगर वे अपने हाथों में पत्थर उठाते हैं तो उन्हें समझाया जाना चाहिए। सीएम महबूबा मुफ्ती के साथ प्रेस कांफ्रेंस में राजनाथ सिंह ने कहा कि कश्मीर के भविष्य के बिना भारत का भविष्य नहीं बन सकता

मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने कहा कि वे अपने एजेंडे पर कायम रहेंगी। उन्होंने कहा कि राजनीतिक संकल्प, आर्थिक सशक्तिकरण और गुड गवर्नेंस ही उनका एजेंडा है। इसे वह तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद आगे लेकर चलेंगी। रियासत ने 70 साल से राजनीतिक विनाश और अनिश्चितता देखी है। ऐसे में हालात और भी बदतर हो सकते हैं। मुख्यमंत्री ने कहा कुछ ताकतें अपने खतरनाक एजेंडे के साथ सक्रिय हैं। लोगों को मजहब और इलाकों में बांटना चाहते हैं। ऐसे मंसूबों को हर हाल में नाकाम करना होगा।

कश्मीर घाटी में आतंकवाद के शुरुआती दौर से डेढ़ दशक तक घाटी के भीतरी इलाकों में तैनात रही बीएसएफ की नये सिरे से तैनाती को सख्ती बढ़ने का संकेत माना जा रहा है। मुख्य रूप से सरहद की निगरानी में माहिर बीएसएफ की एक दशक से अधिक समय बाद फिर से घाटी के भीतर इलाकों में तैनाती की गई है। इसकी शुरुआत उपद्रवियों का केंद्र रहे श्रीनगर के लाल चौक और अन्य इलाकों से की गई है। सोमवार से सड़कों पर दिखाई दे रहे बीएसएफ के जवानों की टुकड़ियां मंगलवार को और एक्टिव हो गईं। इससे उपद्रवियों को भी सख्ती बढ़ने का

जम्मू कश्मीर में केंद्र के शांति मिशन में अग्रत: सकलम शास्त्रम, पृष्ठत: सशर: धनु:- की नीति के आधार पर रणनीति तैयार की गई है। इसके तहत सभी पक्षों से वार्ता के जरिए स्थिति सामान्य बनाने की कोशिश होगी लेकिन उपद्रवियों और आतंकियों को किसी तरह की रियायत की गुंजाइश नहीं है। सभी पक्षों से वार्ता के लिए पहल हो रही है और दूसरी ओर हिंसक प्रदर्शनकारियों से निपटने के लिए बीएसएफ को खुली छूट भी होगी। केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह के प्रस्तावित कश्मीर दौरे में आंतरिक सुरक्षा की समीक्षा के साथ नागरिक संगठनों से बातचीत संभव है लेकिन फिलहाल वार्ता