पश्चिम बंगाल के मालदा में न्यायिक अधिकारियों के कथित घेराव और धमकी मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट(Supreme Court of India) ने राज्य सरकार पर कड़ा रुख अपनाया है। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने मुख्य सचिव से तीखे सवाल पूछते हुए कहा, “आप फोन क्यों नहीं उठाते?” जिससे पूरा मामला और गंभीर हो गया।
सुनवाई के दौरान National Investigation Agency (NIA) ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि इस पूरे मामले में अब तक 11 एफआईआर दर्ज की जा चुकी हैं। इनमें से तीन एफआईआर सीधे तौर पर न्यायिक अधिकारियों को धमकाने और उनके घेराव से जुड़ी हैं, जबकि अन्य मामले स्थानीय स्तर पर की गई नाकेबंदी और पुलिस की कथित लापरवाही से संबंधित हैं।
एजेंसी ने यह भी जानकारी दी कि एक महिला जज को कार्यक्रम स्थल पर जाने से रोका गया था। कोर्ट ने इस पर गंभीर चिंता जताते हुए पूछा कि क्या वही जज थीं, जो कथित तौर पर वीडियो में रोती नजर आई थीं। जांच में अब तक 24 लोगों की गिरफ्तारी और 300 से अधिक संदिग्धों की पहचान की बात भी सामने आई है।
जांच NIA को सौंपने का आदेश
NIA ने सभी मामलों की जांच अपने हाथ में लेने की अनुमति मांगी, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत सभी 12 मामलों की जांच एजेंसी को सौंप दी। कोर्ट ने राज्य पुलिस को निर्देश दिया कि सभी केस डायरी और दस्तावेज तुरंत एनआईए को सौंपे जाएं।
मुख्य सचिव पर कोर्ट की नाराजगी
सुनवाई के दौरान पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव और डीजीपी की ओर से हलफनामा दाखिल किया गया। राज्य पुलिस ने बताया कि दो आरोपियों की गिरफ्तारी हो चुकी है। हालांकि, कोर्ट राज्य सरकार के रवैये से संतुष्ट नहीं दिखा।
मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी करते हुए कहा कि प्रशासन को हाईकोर्ट के आदेशों को गंभीरता से लेना चाहिए था। वहीं, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से जुड़े मुख्य सचिव ने सफाई दी कि वह बैठक में व्यस्त थे और कॉल मिस हो गया। इस पर कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि अधिकारी खुद को इतना ऊपर न समझें कि उनसे संपर्क ही न हो सके।
सख्त संदेश के तौर पर देखा जा रहा फैसला
कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि समय पर संवाद होता तो स्थिति को बेहतर तरीके से संभाला जा सकता था। साथ ही, मुख्य सचिव को हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस से माफी मांगने की सलाह दी गई।
पूरा मामला प्रशासनिक लापरवाही और सुरक्षा चूक से जुड़ा माना जा रहा है, जिस पर अदालत ने बेहद सख्त रुख अपनाते हुए स्पष्ट संदेश दिया है कि न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा से कोई समझौता नहीं किया जा सकता।