जहां आमतौर पर तलाक को समाज में दुख, शर्म या असफलता के रूप में देखा जाता है, वहीं मेरठ(Meerut News) में एक पिता ने इस सोच को पूरी तरह बदलकर रख दिया। यहां एक बेटी की घर वापसी को मातम नहीं, बल्कि नए जीवन की शुरुआत मानते हुए जश्न के रूप में मनाया गया। ढोल-नगाड़ों की गूंज, फूलों की मालाएं और खुशियों से भरा माहौल यह नजारा किसी शादी से कम नहीं था, फर्क सिर्फ इतना था कि यह जश्न एक नई शुरुआत का था।
रिटायर्ड जज ज्ञानेंद्र शर्मा ने अपनी इकलौती बेटी प्रणिता शर्मा का स्वागत उसी सम्मान और प्यार के साथ किया, जैसे कभी उनकी विदाई के समय किया था। परिवार के सदस्य काले रंग की टी-शर्ट पहने नजर आए, जिन पर “I Love My Daughter” लिखा था। मिठाइयां बांटी गईं और कचहरी से लेकर घर तक का माहौल उत्सव में बदल गया।
शादी के बाद नहीं बदले हालात
प्रणिता की शादी 14 दिसंबर 2018 को एक आर्मी मेजर से हुई थी। लेकिन शुरुआती समय से ही रिश्ते में तनाव बना रहा। समय बीतने के साथ ससुराल में व्यवहार और अधिक कठोर होता गया। मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक उत्पीड़न ने उनकी जिंदगी को प्रभावित किया। एक बेटे के जन्म के बाद भी हालात में सुधार नहीं आया, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। आखिरकार प्रणिता ने अपने आत्मसम्मान को प्राथमिकता देते हुए तलाक का निर्णय लिया। 4 अप्रैल 2026 को मेरठ फैमिली कोर्ट ने इस फैसले पर मुहर लगा दी। इसके बाद उनकी घर वापसी को परिवार ने हार नहीं, बल्कि साहस और आत्मनिर्भरता की जीत के रूप में मनाया।
प्रणिता, जो शास्त्री नगर स्थित एक ज्यूडिशियल अकादमी में फाइनेंस डायरेक्टर हैं और मनोविज्ञान में पोस्ट ग्रेजुएट भी हैं, ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि महिलाओं के लिए सबसे जरूरी है आत्मनिर्भर और मजबूत बनना। उन्होंने अपील की कि किसी भी प्रकार की प्रताड़ना सहने के बजाय आवाज उठानी चाहिए। साथ ही उन्होंने अभिभावकों को सलाह दी कि बेटियों की शादी में जल्दबाजी न करें, पहले उन्हें शिक्षित और आत्मनिर्भर बनाएं।
पिता ने दी समाज को नई सोच
प्रणिता के पिता का कहना है कि बेटी कोई वस्तु नहीं होती, जिसे शादी के बाद पराया मान लिया जाए। अगर वह दुखी है, तो उसे वापस लाना परिवार की जिम्मेदारी है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उन्होंने किसी तरह का मुआवजा या सामान लेने से इनकार किया और केवल अपनी बेटी की खुशी को प्राथमिकता दी। यह घटना समाज के लिए एक मजबूत संदेश है कि बेटियों को बोझ नहीं, बल्कि सम्मान और अधिकार के साथ देखा जाना चाहिए। उनकी खुशियों और आत्मसम्मान को सबसे ऊपर रखना ही असली जिम्मेदारी है।