Garud Commandos: ईरान क्षेत्र में जारी तनाव के बीच अमेरिका द्वारा अपने एफ-15 लड़ाकू विमान के पायलट को दुश्मन इलाके से सुरक्षित निकालने की खबर ने दुनिया भर में कॉम्बैट सर्च एंड रेस्क्यू (CSAR) ऑपरेशनों की अहमियत को फिर से सामने ला दिया है। आधुनिक युद्ध अब केवल हथियारों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अपने सैनिकों को हर हाल में सुरक्षित वापस लाने की क्षमता भी उतनी ही जरूरी हो गई है। इसी संदर्भ में भारत की वायुसेना की विशेष इकाई ‘गरुड़ कमांडो फोर्स’ की भूमिका चर्चा में है।
कैसे काम करते हैं गरुड़ कमांडो?
CSAR यानी कॉम्बैट सर्च एंड रेस्क्यू मिशन का मकसद युद्ध के बीच फंसे सैनिक या पायलट को सुरक्षित निकालना होता है। भारतीय वायुसेना के गरुड़ कमांडो इसी तरह के बेहद जोखिम भरे अभियानों के लिए प्रशिक्षित किए जाते हैं। ये कमांडो दुश्मन के इलाके में बेहद कम ऊंचाई पर उड़ान भरते हुए हेलीकॉप्टर से उतरते हैं या पैराशूट के जरिए ‘पैरा-ड्रॉप’ करते हैं और लक्ष्य तक पहुंचकर पायलट को सुरक्षित निकालते हैं।
मौत के साए में होता है हर मिशन
ऐसे ऑपरेशन बेहद खतरनाक होते हैं, जहां हर कदम पर जोखिम होता है। गरुड़ कमांडो दुश्मन के रडार से बचते हुए जंगलों, पहाड़ों या दुर्गम इलाकों में उतरते हैं। उनके पास ‘SDR-Air’ जैसे आधुनिक संचार उपकरण होते हैं, जिनकी मदद से वे फंसे पायलट के सिग्नल को ट्रैक कर लेते हैं, जबकि दुश्मन को इसकी भनक तक नहीं लगती।
कैसे पूरा होता है मिशन?
इन मिशनों में हेलीकॉप्टर को बेहद कम ऊंचाई यानी ‘ट्री-टॉप लेवल’ पर उड़ाना पड़ता है ताकि दुश्मन की मिसाइलों से बचा जा सके। साथ ही, छोटे-छोटे ड्रोन लगातार निगरानी करते रहते हैं, जिससे बचने के लिए कमांडो एंटी-ड्रोन गन और जैमर का इस्तेमाल करते हैं। अगर पायलट तक पहुंचने में देरी होती है, तो दुश्मन घात लगाकर हमला कर सकता है। ऐसे में गरुड़ कमांडो को बेहद कम समय में लड़ाई कर पायलट को सुरक्षित बाहर निकालना होता है।
कठिन ट्रेनिंग से गुजरते हैं गरुड़ कमांडो
गरुड़ कमांडो फोर्स की ट्रेनिंग भारतीय सशस्त्र बलों में सबसे कठिन और लंबी मानी जाती है। इनकी ट्रेनिंग करीब 72 हफ्तों यानी लगभग डेढ़ साल तक चलती है, जिसमें कई चरण शामिल होते हैं। इसके बाद भी विशेष प्रशिक्षण जारी रहता है और करीब तीन साल बाद एक कमांडो पूरी तरह ऑपरेशनल बनता है। इस ट्रेनिंग में बेसिक मिलिट्री ट्रेनिंग, एडवांस कमांडो ट्रेनिंग, पैराशूट जंप, जंगल और पहाड़ी युद्ध, काउंटर-टेरर ऑपरेशन और सर्वाइवल स्किल्स जैसे कई कठिन चरण शामिल होते हैं। इसके अलावा उन्हें अत्याधुनिक हथियारों के इस्तेमाल में भी महारत हासिल कराई जाती है।
हथियारों और तकनीक में भी आगे
गरुड़ कमांडो आधुनिक हथियारों के इस्तेमाल में भी बेहद दक्ष होते हैं। उनके पास AK-47, AK-103, सिगसॉयर, तवोर असॉल्ट राइफल, निगेव LMG और गलील स्नाइपर जैसे अत्याधुनिक हथियार होते हैं, जो लंबी दूरी तक सटीक निशाना लगाने में सक्षम हैं।
कैसे बन सकते हैं गरुड़ कमांडो
गरुड़ कमांडो बनने के लिए उम्मीदवार भारतीय वायुसेना में अग्निवीर वायु योजना या अधिकारी पद (NDA, CDSE, AFCAT) के जरिए आवेदन कर सकते हैं। अग्निवीर के लिए आयु सीमा 17.5 से 21 वर्ष और अधिकारियों के लिए 20 से 24 वर्ष निर्धारित है।
कितनी चाहिए शैक्षणिक योग्यता
शैक्षणिक योग्यता के तहत 12वीं में फिजिक्स, मैथ्स और इंग्लिश में कम से कम 50 प्रतिशत अंक या फिर इंजीनियरिंग/ग्रेजुएशन आवश्यक है। चयन प्रक्रिया में लिखित परीक्षा के बाद सबसे कठिन चरण फिजिकल फिटनेस और अडाप्टेबिलिटी टेस्ट का होता है, जिसे पार करना बेहद चुनौतीपूर्ण माना जाता है। आज के बदलते युद्ध परिदृश्य में गरुड़ कमांडो जैसे विशेष बल न केवल देश की सुरक्षा को मजबूत करते हैं, बल्कि संकट के समय सैनिकों की जिंदगी बचाने में भी अहम भूमिका निभाते हैं।
Read More:

