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23 मार्च 1931 को क्यों हंसते-हंसते फांसी पर चढ़ गए थे ‘भगत सिंह’, क्या था वो कारण जिसने उन्हें बना दिया अमर?

आज भारत भगत सिंह, शिवराम हरि राजगुरु और सुखदेव थापर की पुण्यतिथि पर उन्हें याद कर रहा है। इन्हें 23 मार्च, 1931 को लाहौर की सेंट्रल जेल में फांसी दी गई थी। 23 साल की उम्र में उनके बलिदान ने उन्हें स्वतंत्रता आंदोलन का अमर नायक बना दिया। भगत सिंह(Bhagat Singh) का जन्म 1907 में फैसलाबाद जिले के बंगा गांव में हुआ था। बचपन में ही उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी और स्वतंत्रता संग्राम में पूरी तरह शामिल हो गए। जब उनके माता-पिता ने उनकी शादी करवाने की कोशिश की, तो वे घर छोड़कर कानपुर चले गए।

लाला लाजपत राय की मौत का लेना था बदला

दिसंबर 1928 में लाला लाजपत राय की मृत्यु का बदला लेने के लिए भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु ने पुलिस अधीक्षक जेम्स स्कॉट की हत्या की योजना बनाई। लेकिन गलती से सहायक पुलिस अधीक्षक JP Saunders की हत्या हो गई। पहचान छिपाने के लिए भगत सिंह ने दाढ़ी मुंडवाई, बाल कटवाए ताकि वे लाहौर से कलकत्ता भाग सकें

दुर्गा भाभी ने भागने में की मदद

भागने के लिए उन्हें पुलिस के घेरे से बाहर निकलने के लिए एक सम्मानित विवाहित पुरुष के रूप में छिपने जरूरी था और उनके इस मिशन में उनकी मदद की एक साहसी महिला ने जिन्हें ‘दुर्गा भाभी’ के नाम से ज्यादा जाना जाता है वही उनकी ‘नकली’ पत्नी दुर्गा देवी बनीं वो ही वो महिला थीं जिन्होंने नवंबर 1928 में लाहौर से भागने में भगत सिंह और सुखदेव की बहादुरी से मदद की और 400 पुलिसकर्मियों को चकमा देकर वो कलकत्ता भाग गए थे 

दिल्ली के सेंट्रल असेंबली हॉल में बम ब्लास्ट

अप्रैल 1929 में भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने दिल्ली के सेंट्रल असेंबली हॉल में बम फेंक कर “इंकलाब जिंदाबाद!” का नारा लगाया। इसके बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। 23 मार्च, 1931 को भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को लाहौर षड्यंत्र केस में फांसी दी गई।

साहस देख रोने लगा था जेल का नाई 

उनके अंतिम क्षण अद्भुत साहस और धैर्य से भरे हुए थे। जेल का नाई भी उनके जज्बे को देखकर रो पड़ा। भगत सिंह ने मौत के सामने भी अपने सिद्धांतों और ईमानदारी से कोई समझौता नहीं किया। उन्होंने दिखाया कि सच्चा साहस केवल शारीरिक वीरता नहीं, बल्कि अपने विचारों और आदर्शों के प्रति अडिग रहने में भी है। आज बलिदान दिवस पर हम उन्हें याद कर सिर्फ सलाम नहीं करते, बल्कि उनके जज्बे और बलिदान से प्रेरित होकर अपने देश और समाज के लिए कुछ करने का संकल्प लेते हैं।

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