चीन के OBOR के जवाब में भारत का ‘SASEC’, कई देशों को जोड़ेगा ये प्रोजेक्ट

दिल्ली

चीनी हुक्मरान एक तरफ भारत के साथ सौहार्दपूर्ण संबंधों की वकालत करते हैं, तो दूसरी तरफ वो धमकी भी देते हैं. ‘वन बेल्ट, वन रोड’ के जरिए दुनिया में चीन अपने दबदबे को और मजबूत करने की फिराक में है, लेकिन भारत की कामयाबी उसे पसंद नहीं आती.

एक तरफ चीन क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को स्थापित करने की कोशिश करता है, तो उसे ये बात नागवार लगती है कि भारत ठीक उसके नक्शेकदम पर चलने की कोशिश क्यों कर रहा है. हाल ही में चीन ने डोकलाम के मुद्दे पर भारत से लड़ाई करने की धमकी तक दी. लेकिन भारत ने चीन को स्पष्ट संदेशा दिया कि वो डरने वाला नहीं है.

इन सबके बीच चीन की धार को कुंद करने के लिए भारत ने भी अपने पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को एक नई ऊंचाई पर ले जाने का फैसला किया है. चीन के खिलाफ भारत के इस हथियार का नाम है सासेक (SASEC).

भारत ने कई वर्ष पहले भूटान, नेपाल, बांग्लादेश व म्यांमार को जोड़ने के लिए सासेक (साउथ एशियन सब रिजनल इकोनॉमिक को-ऑपरेशन) कॉरिडोर शुरू किया था. इसके तहत मणिपुर के इम्फाल-मोरेह (म्यांमार) को जोड़ने की सड़क परियोजना को 1630.29 करोड़ रुपये और दिए गए हैं. इस मार्ग को पूर्वी एशियाई बाजार के लिए भारत का प्रवेश द्वार माना जाता है.

भारत की योजना इस मार्ग के जरिये न सिर्फ पूर्वी एशियाई बाजारों को पूर्वोत्तर राज्यों को जोड़ने की है, बल्कि वह यह भी दिखाना चाहता है कि क्षेत्रीय कनेक्टिविटी की अवधारणा को वह स्वीकारता है. इंफाल-मोरेह मार्ग के निर्माण के साथ ही बैंकाक तक पहुंचने के लिए भारत को एक वैकल्पिक मार्ग उपलब्ध हो जाएगा. सासेक देशों के बीच बेहतर संपर्क मार्गों से न केवल पड़ोसी देश मजबूत होंगे, बल्कि भारत भी विकास के रास्ते पर और तेजी से आगे बढ़ सकेगा.

सार्क देशों में शामिल बांग्लादेश, भूटान, भारत और नेपाल ने 1996 में साउथ एशियन ग्रोथ क्वाड्रएंगल(SAGQ) की स्थापना की. इसका मकसद पर्यावरण, ऊर्जा, व्यापार को बढ़ावा देना था. सार्क ने एसएजीक्यू को 1997 में औपचारिक मान्यता दे दी. एसएजीक्यू में शामिल चारों देशों ने मनीला स्थित एशियन डेवलपमेंट बैंक से क्षेत्रीय स्तर पर आर्थिक मजबूती के लिए मदद की अपील की. चार साल बाद 2001 में सासेक का गठन हुआ. 2014 में मालदीव और श्रीलंका को सदस्य बनाया गया. इसके बाद 2017 में म्यांमार सासेक का सदस्य बना.

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