ईरान में चाबहार पोर्ट के निर्माण को लेकर भारत को लग सकता है झटका

दिल्‍ली

भारत, ईरान में चाबहार पोर्ट को विकसित कर रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले साल ये समझौता किया था, लेकिन भारत को पश्चिमी देशों के निर्माता निर्माण सामग्री उपलब्‍ध कराने से हिचकिचाने लगे हैं. इन निर्माताओं को ये डर सता रहा है कि कहीं अमेरिका के राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप फिर से ईरान पर प्रतिबंध ना लगा दें. ऐसे में उनका यहां पैसा लगाना घाटे का सौदा साबित हो सकता है.

दरअसल, निर्माताओं का डर बेवजह भी नहीं है. अमेरिका ने 2015 में ही ईरान से प्रतिबंध हटाया था, लेकिन डोनाल्‍ड ट्रंप अपने चुनाव प्रचार के दौरान ही ईरान पर मध्‍य पूर्व देशों के लिए बड़ा खतरा होने का आरोप लगाते रहे हैं. वे ईरान के साथ हुए परमाणु करार के भी खिलाफ हैं.

वहीं, ट्रंप ने साल की शुरुआत फरवरी में मिसाइल परीक्षणों को लेकर ईरान के खिलाफ नए प्रतिबंध लगा दिए थे. पिछले कुछ समय से फिर ये आशंका जताई जा रही है कि ईरान पर अमेरिका फिर नए प्रतिबंध लगा सकता है. ऐसे में कई पश्चिमी कंपनियां चाबहार पोर्ट से जुड़े निर्माण कार्य के टेंडर में बोली लगाने से बच रही हैं.

साल 2016 में पीएम नरेंद्र मोदी के ईरान दौरे के समय भारत और ईरान के बीच चाबहार पोर्ट को विकसित करने का समझौता हुआ था. साउथ-ईस्ट ईरान में स्थित चाबहार के जरिए अफगानिस्तान पहुंचने के लिए भारत को पाकिस्तान के सहारे की जरूरत नहीं रह जाएगी. जब 2015 में अमेरिका ने ईरान पर लगाए गए प्रतिबंध हटाए, तब भारत ने 2016 में इस पोर्ट के विकसित करने के लिए 500 मिलियन डॉलर खर्च करने का निश्‍चय किया था.

हालांकि, सरकारी सूत्रों के मुताबिक, चाबहार पोर्ट को विकसित करने वाली भारतीय फर्म अभी तक निर्माण कार्य से जुड़ा एक भी टेंडर किसी कंपनी को सुपुर्द नहीं कर पाई है. ऐसे में ईरान में भारत की रणनीतिक महत्वाकांक्षाओं को अमेरिका की वजह से झटका लग सकता है.

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